दिल्ली : दिल्ली ब्लास्ट मामले में नए खुलासों के बीच तिर्वा मेडिकल कॉलेज में कार्यरत रही डॉ. शाहीन को लेकर कई चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। कॉलेज के कर्मचारियों और अधिकारियों के अनुसार, मान्यता प्रक्रिया के दौरान उनकी नियुक्ति तो हुई थी, लेकिन वह ड्यूटी पर लगभग दिखाई ही नहीं दीं और उनका व्यवहार भी विवादों में रहा।
मान्यता प्रक्रिया के दौरान हुआ था ट्रांसफर, छह महीने बाद वापस भेजा गया
राजकीय मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की मान्यता के प्रयासों के चलते 2009-10 में कानपुर व लखनऊ सहित कई जगहों से करीब 40 चिकित्सा शिक्षकों का स्थानांतरण तिर्वा मेडिकल कॉलेज किया गया था। इसी प्रक्रिया में डॉ. शाहीन फार्माकोलॉजी विभाग में प्रवक्ता के रूप में कॉलेज से जुड़ीं।
हालांकि, मान्यता के मानक पूरे न होने के कारण मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को आवेदन नहीं भेजा जा सका, और करीब छह महीने बाद उन्हें दोबारा कानपुर भेज दिया गया।
सिर्फ पहले दिन आईं कॉलेज, फिर नहीं दिखीं—कर्मचारियों का दावा
कॉलेज के कर्मचारियों के मुताबिक, डॉ. शाहीन केवल ज्वाइनिंग के दिन ही कॉलेज आई थीं। इसके बाद वह ड्यूटी पर एक भी दिन उपस्थित नहीं हुईं। उस दौरान कॉलेज में अभी छात्र नहीं आए थे और एमबीबीएस का पहला सेशन 2012 में शुरू हुआ था।
अक्खड़ व्यवहार और अलग-थलग रहना पसंद—स्टाफ की बातें
2009 में डॉक्टर, नर्स और लिपिकों की नियुक्तियों के दौरान कर्मचारियों ने बताया कि डॉ. शाहीन का स्वभाव घमंडी और तेज बताया जाता था। वे स्टाफ से दूरी बनाकर रखती थीं और अधिकांश समय अकेले रहना पसंद करती थीं।
कार में आते थे उनके समुदाय के लोग, दूसरे वर्ग के मरीजों से दूरी
कर्मचारियों के अनुसार, डॉ. शाहीन की कार में अक्सर उनके विशेष समुदाय के एक-दो लोग मौजूद रहते थे।
फार्माकोलॉजी विभाग में होने पर वे ओपीडी में नहीं बैठती थीं, लेकिन अपने समुदाय के मरीजों से सम्मानपूर्वक बात करती थीं, जबकि अन्य वर्ग के मरीजों से उनका व्यवहार कठोर बताया गया।
कर्मचारियों ने यह भी दावा किया कि वह दूसरे वर्ग के लोगों से बातचीत करना भी पसंद नहीं करती थीं, जिससे उनके व्यवहार पर कई सवाल खड़े होते रहे।
Author: Deepak Mittal










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