झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का 81 साल की उम्र में निधन हो गया है। भले ही आज बीजेपी और झारखंड मुक्ति मोर्चा एक दूसरे के खिलाफ हैं, लेकिन एक वक्त ऐसा था जब दोनों पार्टियों के गठबंधन की चर्चा थी।
2014 का साल, लोकसभा चुनाव की सरगर्मी चरम पर थी। नरेंद्र मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे और बीजेपी के पीएम उम्मीदवार भी, हर तरफ उनकी ही चर्चा थी। इसी बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के दिग्गज नेता शिबू सोरेन की उनसे मुलाकात ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी। यह मुलाकात सिर्फ एक औपचारिक बैठक नहीं थी, बल्कि झारखंड की सियासत और राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़े गठबंधन की नींव रखने का मौका थी। लेकिन इस मुलाकात में ऐसा क्या हुआ, जिसने सबका ध्यान खींचा?
गठबंधन को लेकर शिबू सोरेन की शर्तें
शिबू सोरेन, जिन्हें ‘दिशोम गुरु’ के नाम से जाना जाता है, ने इस मुलाकात में नरेंद्र मोदी के सामने झारखंड के विकास का खाका खींचा। सूत्रों के मुताबिक, शिबू ने गठबंधन के लिए अपनी शर्तें साफ रखीं। इसमें राज्य के लिए विशेष आर्थिक पैकेज, आदिवासी समुदायों के हितों की रक्षा और स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता जैसी शर्तें थीं। उनकी यह सख्ती बीजेपी के लिए एक तरफ चुनौती थी, तो दूसरी तरफ गठबंधन को मजबूती देने का मौका भी। शिबू का यह कदम झारखंड की जनता को यह संदेश दे रहा था कि वह अपने राज्य के हितों से कोई समझौता नहीं करेंगे।
विपक्ष ने लगाया अवसरवाद का आरोप
इस मुलाकात के बाद विपक्ष ने शिबू सोरेन पर अवसरवादिता का आरोप लगाया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने दावा किया कि JMM, जो हमेशा से आदिवासी हितों और क्षेत्रीय अस्मिता की बात करता रहा, अब बीजेपी की गोद में बैठने को तैयार है। लेकिन शिबू ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी प्राथमिकता झारखंड की बेहतरी है, न कि सियासी जोड़-तोड़। उन्होंने यह भी साफ किया कि गठबंधन का फैसला उनकी पार्टी और जनता के हितों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।
क्या रहा मुलाकात का नतीजा?
शिबू सोरेन और नरेंद्र मोदी की ये मुलाकात गठबंधन के लिहाज से सफल नहीं हुई। दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। इस चुनाव में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन किया। लेकिन शिबू सोरेन ने झारखंड के विकास को ध्यान में रखकर ये मुलाकात जरूर की।
Author: Deepak Mittal










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