नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (19 नवंबर) को सभी महिलाओं, खासकर उन हिंदू विधवा महिलाओं से आग्रह किया है कि वे अपनी संपत्ति की वसीयत अवश्य बनाएं। कोर्ट ने कहा कि इससे यह सुनिश्चित होगा कि उनकी संपत्ति उनकी मर्जी के अनुसार वितरित हो और भविष्य में माता-पिता और ससुराल पक्ष के बीच मुकदमेबाजी से बचा जा सके।
कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(1) के अंतर्गत आने वाली महिलाएं अपनी स्व-अर्जित संपत्ति सहित अपनी संपत्ति की वसीयत बनाएं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि किसी महिला की मृत्यु बिना वसीयत के हो जाती है, तो मामले में मध्यस्थता प्रक्रिया अपनाई जाए और समझौते को न्यायालय के आदेश के रूप में माना जाएगा।
याचिका का मुद्दा
इस याचिका में धारा 15(1)(बी) को चुनौती दी गई थी, जिसमें कहा गया है कि बिना पुत्र, पुत्री या पति के मरने वाली हिंदू महिला की संपत्ति उसके पति के उत्तराधिकारियों को मिलती है, जबकि माता-पिता को यह अधिकार नहीं होता। याचिकाकर्ता ने इसे अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन बताया।
अदालत का विचार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 15(1)(बी) की वैधता पर फिलहाल निर्णय नहीं लिया गया है। अदालत ने महिलाओं को स्पष्ट रूप से सुझाव दिया कि वे अपनी संपत्ति की सुरक्षा के लिए वसीयत बनाएं, ताकि भविष्य में किसी भी विवाद या मुकदमेबाजी से बचा जा सके।
वसीयत बनाने के फायदे
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संपत्ति का वितरण महिला की इच्छा के अनुसार होगा।
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परिवार में विवाद और मुकदमेबाजी से बचा जा सकेगा।
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माता-पिता और ससुराल पक्ष के बीच झगड़े नहीं होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाएं स्वतंत्र रूप से अपने अधिकारों की रक्षा कर सकती हैं और मध्यस्थता या न्यायालय के माध्यम से किसी भी विवाद का समाधान कर सकती हैं।
Author: Deepak Mittal










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