22 साल बाद इंसाफ की दस्तक! – हाईकोर्ट से बाबू को मिली बड़ी राहत, भ्रष्टाचार के सभी आरोपों से बरी

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22 साल बाद इंसाफ की दस्तक! – हाईकोर्ट से बाबू को मिली बड़ी राहत, भ्रष्टाचार के सभी आरोपों से बरी

2002 में रिश्वतखोरी के मामले में फंसे बिल्हा तहसील के बाबूराम पटेल को हाईकोर्ट ने दी क्लीन चिट, कहा – ‘सिर्फ नोटों की बरामदगी रिश्वत का सबूत नहीं’

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिल्हा तहसील कार्यालय के तत्कालीन रीडर-क्लर्क बाबूराम पटेल को बड़ी राहत देते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लगे सभी आरोपों से बरी कर दिया है।
न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि आरोपी ने रिश्वत की मांग या अवैध लाभ के रूप में धन स्वीकार किया था।

मामला 20 फरवरी 2002 का है, जब शिकायतकर्ता मथुरा प्रसाद यादव ने लोकायुक्त पुलिस में आरोप लगाया था कि बाबूराम पटेल ने उसके पिता की जमीन का खाता अलग करने के बदले 5000 रुपए रिश्वत मांगी थी, जो बाद में 2000 रुपए में तय हुई।
लोकायुक्त टीम ने ट्रैप कार्रवाई के दौरान पटेल को 1500 रुपए लेते हुए पकड़ा था। कपड़े और हाथ धोने पर घोल का रंग गुलाबी हो गया था, जिसके आधार पर उसे दोषी ठहराया गया।

बाद में 30 अक्टूबर 2004 को बिलासपुर के प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने पटेल को एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की। बचाव पक्ष के अधिवक्ता विवेक शर्मा ने तर्क दिया कि यह मामला निजी द्वेष और राजनीतिक रंजिश का परिणाम था। शिकायतकर्ता की पत्नी पूर्व सरपंच थीं और उनके खिलाफ चल रही जांच में पटेल की भूमिका रही थी।

विवेक शर्मा ने यह भी बताया कि जब्त की गई रकम रिश्वत नहीं बल्कि पट्टा शुल्क का बकाया था। साथ ही, ट्रैप टीम के सदस्यों ने भी पैसे की बरामदगी के स्थान को लेकर विरोधाभासी बयान दिए थे — किसी ने दाईं जेब, किसी ने बाईं, तो किसी ने पीछे की जेब बताई।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों बी. जयाराज बनाम राज्य आंध्र प्रदेश (2014) और सौंदर्या राजन बनाम राज्य (2023) का हवाला देते हुए कहा कि —

“सिर्फ नोटों की बरामदगी रिश्वत साबित नहीं करती, जब तक मांग और स्वीकारोक्ति का ठोस प्रमाण न हो।”

अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता खुद स्पष्ट नहीं कर पाया कि वह रकम रिश्वत थी या शुल्क, और रिकॉर्ड की गई बातचीत में आरोपी की आवाज भी पहचानने योग्य नहीं थी।

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित करने में विफल रहा, इसलिए ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द किया जाता है।
इसके साथ ही बाबूराम पटेल को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया — 22 साल बाद आखिरकार उन्हें इंसाफ मिल गया।

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