न हाई कोर्ट का डर,न शासन का डर, ऐसे हैं शासन के अधिकारी निकम्मे , निठल्ले और निडर, कृषि विभाग का मामला ..

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जया अग्रवाल

पेंड्रारोड, गौरेला :  कृषि विभाग पेंड्रा रोड उर्फ गौरेला का मामला संज्ञान में आया है। जिसमें कृषि अनुविभागीय अधिकारी गौरेला एवं उपसंचालक कृषि जिला जी. पी. एम. पेंड्रारोड के द्वारा बिना किसी कारण के सेवानिवृत होने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों को कई कई वर्षों तक पेंशन एवं पेंशन के स्वतवों तथा बकाया क्लेम्स के भुगतानों की अदाएगी नहीं करते हैं ।


शासन के  नियमों अनुसार सेवा निवृत्ति के 5 वर्ष पहले से विभिन्न चरणों में सेवा निवृत्ति  संबंधी कार्यवाहियां कर, सेवा निवृत्ति दिनांक को संपूर्ण भुगतानो सहित सेवा निवृत्ति की जाना चाहिए, किंतु अधिकारियों के निकम्मे, निठल्ले और भ्रष्टाचारी रवैयों के कारण सेवा निवृत्ति के दिनांक के पश्चात सेवा निवृत्ति संबंधी कार्यवाहियां शुरू करने के बारे में सोचते हैं।


शासन के ढुलमुल, ढीले अति उदारवादी, नरमतम रवैया के कारण अधिकारियों को शासन के नियम विरुद्ध कृत्यों को करने में निडरता पूर्वक या कहे कि निर्लज्जता पूर्वक  महारत हासिल है, यहां तक की उन्हें हाई कोर्ट तक का भी लेश मात्र भी डर नहीं सताया करता है, बेलगाम घोड़ी की तरह चलने वाले अधिकारी, शासन को उनकी टूटी बैसाखियों पर अवलंबित होने का भरपूर शोषण कर, भ्रष्टाचार को चरम पर करते हुए.

शुद्ध ईमानदारी पूर्वक एवं नियम पूर्वक कार्य करने का सफेदपोश ढकोसला, समस्त शासकीय कार्यालयों में अंतरंग व्याप्त है।  असंवेदनशील एवं असहाय शासन देश में व्याप्त भारी भ्रष्टाचार एवं अपने को गैर भ्रष्टाचारी दर्शाने वाले अधिकारियों के सामने, अशक्त अपंग, अपाहिज एवं मजबूर के सिवाय और कोई छवि आम जनता में नहीं बची दिखाई देती है, जिससे आम जनता भी मजबूर जीवन जीने को मजबूर है।


50 बार शासन बदले, या बदले 50 बार कलेक्टर, कमिश्नर, पर नहीं बदलता है, तो कभी आम जन जीवन।
।। संपूर्ण मामला क्या है।। डॉ. ऐन. के. गर्ग , दिनांक 30. 9. 22 को वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी के पद से कार्यालय अनुविभागीय अधिकारी गौरेला से सेवानिवृत्त हुए थे। दो वर्ष तक पेंशन प्रकरण ही नहीं बनाया गया था, ना ही पेंशन एवं पेंशन के स्वतवों, बकाया क्लेम्स का भुगतान किया जा रहा था। अंतत: हाई कोर्ट छत्तीसगढ़ में पेंशन हेतु गुहार लगाने पर दिनांक 2.5. 24 को पेंशन एवं पेंशन के स्वतवों को भुगतान करने के आदेश के पश्चात भी आज तक पेंशन एवं स्वातवों का भुगतान नहीं किया गया है। 


2 साल बाद आनन फानन में पेंशन पे ऑर्डर एवं जी.एफ. एफ. अदाएगी आदेश त्रुटिपूर्ण गणनाओं सहित आर्थिक क्षति कारक जारी करके, बिना वास्तविक भुगतान किये इति समझकर पुनहै चिरनिद्रालीन हो गए हैं। जो 90% अनुमानित पेंशन, अनियमित रूप से दे रहे थे, कभी- कभी, वह भी जुलाई 24 से बंद कर आज तक एक पैसा भी नहीं दिया जा रहा है। दीपावली बिना एक पैसा मिले निकल गई । अधिकारियों, बाबुओं की बेशर्मी और निर्लज्जता की पराकाष्ठा हो गई। शासन की ओर से की नियुक्त सरकारी वकील हाईकोर्ट को किस तरह गुमराह कर गए 8 अगस्त 24 को, कि इनका सब पैसा भुगतान हो चुका है, जो कुछ बचा है वह एक-दो दिन में भुगतान हो जाएगा।

यह दिनांक 8.8.24 का कथन, आज तक निरंक भुगतान को दर्शाता है, कि न्याय पद्धति कैसी है? वैसे तो न्याय प्रणाली को सब भली भांति जानते हैं, कि निर्दोष जेल में और अपराधी बेल में, जिंदगी काटते हैं, इस सिद्धांत पर की, 100 दोषी छूट जाए, पर एक निर्दोष को सजा ना हो पाए। वैसे हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट की विशेषकर जैसी छवि कुछ वर्षों पूर्व तक थी, वह उनके ही कमजोर फैसलों एवं मनमाने नियम विरुद्ध, भाई भतीजावाद से ग्रसित, आदि के विभिन्न कारण एवं कार्यपालिका के निरंकुश शक्ति प्रदर्शन से वैसी या कैसी भी नहीं रह गई है।


दूसरे प्रकरण में उपरोक्त कृषि कार्यालय से दिनांक 30.6.23 को जे.जी. गोस्वामी को बिना सेवा निवृत्ति आदेश जारी किए ही सेवा निवृत कर दिया गया, पूर्व प्रकरण की तरह ही इनकी भी कोई विभागीय जांच, वसूली, मांग, घटना, जांच आदि कुछ नहीं होने के बावजूद भी आज दिनांक तक पेंशन का प्रकरण नहीं बनाया गया है, ना ही पेंशन एवं पेंशन के स्वतवों का भुगतान किया जा रहा है।

अधिकारियों के चिरनिद्रालीन सुसुप्तावस्ता, निठल्ले, निकम्मे पन सरकारी काम करने के अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों के अरुचि पूर्ण उदासीन रवैया समझ से परे हैं। शासन की आंखों पर भी काली पट्टी बांधी हैं जैसी न्याय की मूर्ति पर बंधी थी। ऐसा एक ही कार्यालय या जिले में होता है, ऐसा नहीं है, बल्कि संपूर्ण, यत्र, तत्र, सर्वत्र व्याप्त ट्रेजेडी है, जो कैंसर की बीमारी जैसी अंतिम ला इलाज बीमारी की तरह भी है, काम करने के और नहीं करने के सब तरीके, बहाने अधिकारियों, बाबूओ के पास है, यह शासन की सुशासन, भाजपा नीत, मोदी की गारंटी प्रीत की,  सरकारी दिवालियेपन की, अराजकता, हाई कोर्ट का ढीला, लचीलापन एवं अप्रत्यक्षत: शासन की पक्षधर होने से, न्याय की विफलता से इनकार नहीं किया जा सकता है।


पेंशनर के एवं उनके परिवारों के, संविधान में दिए गए मूल अधिकारों का उल्लंघन नहीं है, तो क्या है? जिनकी रक्षा करने में न्यायपालिका एवं कार्यपालिका अक्षम के साथ असहाय सिद्ध है। अभी जब शासन ने 28 अक्टूबर 24 तक पेंशन भुगतान का आदेश जारी नहीं किया था। पेंशनरों का महंगाई भत्ता चार प्रतिशत का आदेश जारी नहीं किया था। मंहगाई भत्ता का एरियर्स पेंशनरों का हड़प लिया जाता है।
पेंशनरों से आयकर वसूला जाता है। केंद्र एवं राज्य के डी .ए .से कम दर पर पेंशनरों को दिया जाता है।
सारंशीकृत बेची गई पेंशन पर निर्धारित से अत्यधिक वसूली करने जैसे, सरकार के एवं उसके इस कर्ण धारों के अमानवीय, 

असंवेदनशील, अनैतिक, अमर्यादित, असंतोष एवं अशांति प्रसारक दुष्कृत्यों की श्रृंखला के दुर्लभ प्रजाति….. है, उसके नमूने हैं, जिसमें न्याय पालिका के संलिप्तिकरण का योगदान, अन्याय, अविश्वास को प्रतिफलित करता है।
न्याय की मूर्ति की बंद आंखें तो खुल गई है, सुप्रीम कोर्ट से, अब सरकारे, भी अंधत्व की पट्टी उतार कर गांधारी पना छोड़कर आंखें खोल ले, तो बेहतर होगा, इसीलिए यह समाचार सर्वजन हिताय, सर्व लोकहिताय  प्रकाशित किया जा रहा है।

पेंशनर का ऐसा ही तीसरा मामला इसी कार्यालय से  स्वयं अनुविभागीय कृषि  अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति दिनांक 28. 2. 23 को सी. आर .महिलाग का भी है, जिनका आज तक इन अधिकारियों के द्वारा पेंशन प्रकरण नहीं बनाया जाकर,लंबित  डालकर रखा हुआ है।

यदि कोई इशू थे तो सर्विस काल में क्यों नहीं निपटाते हैं सरकार बनाम ये अधिकारी सोचते है कि रिटायर आदमी बाद में परेशान होगा तो भ्रष्टाचार के एकमात्र साधन से सुलझेगा, यही मानसिकता है, सरकार अधिकारियों के अधीन है, इसमें कोई संदेह की गुंजाइश नहीं है। इससे अपेक्षा है कि सरकार की बंद आंखें खुल जाएं, मंद बुद्धि अधिकारियों, बाबुओं को सद्बुद्धि आ जाए ।

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