पश्चिम बंगाल SIR पर ECI को अपने ‘लॉजिक’ पर फिर से करना होगा विचार

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पश्चिम बंगाल: भारत के चुनाव आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यह प्रक्रिया कथित तौर पर असली मतदाताओं को इतनी परेशान कर रही है कि सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी भी नागरिक को उसके लोकतांत्रिक अधिकार—मतदान—से वंचित न किया जाए।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ECI को निर्देश दिया कि वह अपनी तथाकथित “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” सूची में शामिल मतदाताओं के नाम ग्राम पंचायत भवनों, तालुकों के ब्लॉक कार्यालयों और पश्चिम बंगाल के वार्ड कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करे। साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रभावित लोगों को पंचायत और ब्लॉक कार्यालयों में अपने दस्तावेज़ और आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर दिया जाए।

चुनाव आयोग ने “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” के आधार पर राज्य में करीब 1.25 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए हैं। आयोग का दावा है कि 2002 की वोटर लिस्ट से अगली पीढ़ी को लिंक करते समय कई विसंगतियां सामने आईं। इनमें नामों की अलग-अलग स्पेलिंग, माता-पिता और बच्चों के बीच उम्र के अंतर को आधार बनाया गया। कुछ मामलों में यह तर्क दिया गया कि माता-पिता और संतान के बीच उम्र का अंतर 15 साल से कम या 50 साल से ज्यादा है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ECI के इस “लॉजिक” से संतुष्ट नजर नहीं आया। कोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा कि मां और बेटे के बीच 15 साल का उम्र का अंतर कैसे “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” हो सकता है, खासकर ऐसे देश में जहां बाल विवाह जैसी सामाजिक वास्तविकताएं मौजूद रही हैं।

ECI की ओर से दिया गया जवाब भी भरोसा पैदा करने वाला नहीं माना जा रहा है। आयोग का यह कहना कि “अगर ECI पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो वह चुनाव ही न कराए”—लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों के प्रति एक अड़ियल रवैये के रूप में देखा जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि यह रुख ऐसा है, मानो चुनाव आयोग को मतदाताओं के अधिकारों पर बिना जवाबदेही के पूरा नियंत्रण हासिल हो।

विशेषज्ञों का कहना है कि विडंबना यह है कि पूरी प्रक्रिया उसी अविश्वास से शुरू हुई, जो ECI को अपनी ही तैयार की गई वोटर लिस्ट पर है—जिसके आधार पर लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराए गए थे। बावजूद इसके, आयोग अपने फैसलों को सही ठहराने के लिए एक के बाद एक विवादास्पद तर्क पेश करता रहा।

गौरतलब है कि जब बिहार में SIR शुरू किया गया था, तब सुप्रीम कोर्ट ने इसे समावेशी प्रक्रिया बनाने का सुझाव दिया था, न कि बहिष्करण का माध्यम। किसी भी राजनीतिक दल या नागरिक ने मतदाता सूची को शुद्ध करने के अधिकार पर सवाल नहीं उठाया है, लेकिन अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेने से इनकार को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

आलोचकों का कहना है कि चुनाव आयोग को यह समझाना चाहिए कि किसी मतदाता का नाम हटाने का ठोस कारण क्या है, न कि नागरिकों से बार-बार अपने अस्तित्व का प्रमाण मांगना। राहत की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस तर्क से प्रभावित नहीं हुआ।

अब सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग अपने ऊंचे संवैधानिक पद की गरिमा के साथ नागरिकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझेगा। जानकारों का मानना है कि ECI को अपना रवैया बदलते हुए SIR की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और समावेशी बनाना चाहिए, ताकि लोकतंत्र की नींव—मतदाता—को बेवजह परेशान न होना पड़े।

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Author: Deepak Mittal

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