नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया जल्द शुरू होने वाली है। इसको लेकर सरकार ने राजनीतिक सहमति बनाने के लिए विपक्ष से बातचीत शुरू कर दी है। मामले में तेजी ऐसे समय पर आई है जब 14 मार्च को जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने और वहां बड़ी मात्रा में नकदी मिलने की घटना सामने आई थी। जांच रिपोर्ट के बाद सरकार अब एक्शन मोड में है।
पीएम मोदी से मुलाकात, महाभियोग की रणनीति तैयार
इस मुद्दे पर गृहमंत्री अमित शाह और कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इसके अलावा बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा और शाह ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ से भी बातचीत की। इन बैठकों के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरें रिजिजू ने विपक्ष के नेताओं से भी संपर्क साधा।
सर्वसम्मति से निर्णय की कोशिश
किरें रिजिजू ने कहा कि, “यह मामला राजनीतिक नहीं, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा से जुड़ा है। इसलिए सभी दलों को मिलकर फैसला लेना चाहिए।” रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की अगुवाई में बनी तीन जजों की समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ रिपोर्ट तैयार की थी, जो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को सौंपी गई।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में हो चुका है तबादला
जांच के बाद जस्टिस वर्मा का स्थानांतरण इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया था। इस बीच रिपोर्ट में उनके खिलाफ गंभीर आरोप सामने आए, जिससे उनके खिलाफ महाभियोग की मांग तेज हुई।
मॉनसून सत्र में पेश होगा प्रस्ताव
सरकार की योजना है कि 21 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जाए। हालांकि कुछ नेताओं का सुझाव है कि इसके लिए विशेष सत्र भी बुलाया जा सकता है। प्रस्ताव को लाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों का समर्थन जरूरी है।
राजनीतिक सहमति के संकेत
हालांकि संसद में एनडीए का बहुमत है, लेकिन सरकार चाहती है कि यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो, ताकि न्यायपालिका की गरिमा और पारदर्शिता दोनों बनी रहे।
इस पूरे घटनाक्रम पर देश की नजर है, क्योंकि यह भारत के न्यायिक इतिहास का एक अहम मोड़ साबित हो सकता है।
Author: Deepak Mittal










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