
बिलासपुर : कोटा ब्लॉक के ग्राम पंचायत करगीखुर्द में आदिवासी बच्चों के लिए आवासीय छात्रावास का संचालन किया जा रहा था। इस संस्था को शासन की ओर से अनुदान प्राप्त होता था, जिसमें कक्षा छठवीं से लेकर आठवीं तक के बच्चे रहकर इसी परिसर में स्थित स्कूल में पढ़ाई करते थे।
हाल ही में, सरकारी जमीन पर बने इस छात्रावास के बिकने का मामला सामने आया है। यह छात्रावास ठक्करबापा नामक निजी संस्था द्वारा संचालित किया जा रहा था, जो 100 प्रतिशत अनुदान प्राप्त संस्था है। करीब चार साल पहले आदिवासी विभाग ने भवन निर्माण के लिए 10 लाख रुपये का फंड जारी किया था।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस जमीन पर किसी का दावा था तो नियमों के अनुसार इसका सीमांकन होना चाहिए था। लेकिन, न तो आदिवासी विभाग ने और न ही निजी संस्था के पदाधिकारियों ने इस नियम का पालन किया।
खरीदार सुनील यादव ने कहा, “मैंने जिस जमीन को खरीदा है वह राजा साहब की है। उन्होंने ही मुझे तीन लाख 70 हजार रुपये में बेची है। इसका मेरे पास बकायदा एग्रीमेंट भी है।”
वहीं, स्थानीय निवासी देवेश्वर प्रताप का कहना है, “यह जमीन हमारी पुरखों की है। छात्रावास में जगह कम पड़ने के कारण इस जमीन को निजी संस्था को दी गई थी। अब हमने इस पर कब्जा कर लिया है।”
कोटा ब्लॉक के ग्राम पंचायत करगीखुर्द में आदिवासी बच्चों के लिए आवासीय छात्रावास का संचालन किया जा रहा था, जिसमें शासन की ओर से अनुदान प्राप्त होता था। भवन छोटा होने के कारण चार साल पहले संस्था ने आदिवासी विभाग को अतिरिक्त भवन के लिए प्रस्ताव भेजा था, जिसके बाद विभाग ने स्थल निरीक्षण कर 10 लाख रुपये का फंड जारी किया। इस फंड से सरकारी जमीन पर भवन का निर्माण हुआ, जिसका खसरा नंबर 481/1 और रकबा करीब दो एकड़ है।
कुछ दिनों पहले, गांव के निवासी देवेश्वर प्रताप ने इस जमीन पर अपना मालिकाना हक जताया और निजी संस्था को भवन खाली करने के लिए कहा। छात्रावास अधीक्षक राधेलाल टेकाम ने इसकी जानकारी उच्च अधिकारियों को दी, जिसके बाद रातों-रात भवन को खाली कर दिया गया और तीन लाख 70 हजार रुपये में सुनील यादव को बेच दिया गया। इस संबंध में आदिवासी विभाग के सहायक संचालक से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की।
Author: Deepak Mittal









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