मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में लिए गए मृत्युपूर्व बयान पर किया जा सकता है भरोसा..

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नव भारत टाइम्स 24 x 7 के ब्यूरो चीफ जे.के. मिश्रा की रिपोर्ट:

बिलासपुर : मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में दर्ज किए गए मृत्युपूर्व बयान पर भरोसा किया जा सकता है, इस बात को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने हत्या के मामले में सजा के खिलाफ दायर आपराधिक अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

अपील खारिज, सजा बरकरार
अजय वर्मा द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए, डिवीजन बेंच ने कहा कि वह जेल में अपनी शेष सजा काटेगा। दूसरा आरोपी अमनचंद रौतिया, जो जमानत पर था, उसकी जमानत रद्द कर दी गई है और उसे एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया गया है। ऐसा न करने पर उसे हिरासत में लेकर शेष सजा भुगतनी होगी।

मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उमानाथ यादव की बेटी गंगा यादव की हत्या से संबंधित है। 17 अगस्त 2020 की रात, गंगा यादव का भाई लल्ला यादव उसे जली हुई अवस्था में घर लाया। उसे बलौदाबाजार जिला अस्पताल में भर्ती किया गया और बाद में रायपुर रेफर कर दिया गया। उपचार के दौरान, गंगा ने अपने परिवार को बताया कि अजय वर्मा ने उससे मिलने के लिए यादव समाज भवन बुलाया और फिर उस पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी। अमन रौतिया पर आरोप है कि उसने साक्ष्य मिटाने में मदद की।

मृत्युपूर्व बयान और अदालत का निर्णय
गंगा यादव का मृत्युपूर्व बयान कार्यकारी मजिस्ट्रेट अंजलि शर्मा ने 18 अगस्त 2020 को दर्ज किया था, जिसमें उसने अजय वर्मा पर तेल डालकर आग लगाने का आरोप लगाया था। गंगा 96 प्रतिशत जल चुकी थी और कुछ घंटे बाद उसकी मृत्यु हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसकी मौत का कारण जलने के घाव और उसकी जटिलताएं बताई गई।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कहा कि गंगा के शरीर पर पट्टियां बंधी हुई थीं, जिससे अंगूठे का निशान लगाना संभव नहीं था। उन्होंने मृत्यु पूर्व बयान में ओवर राइटिंग का भी मुद्दा उठाया, जो सीआरपीसी की धारा 163 का उल्लंघन है।

डिवीजन बेंच की टिप्पणी
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि यदि अदालत यह मानती है कि मृत्युपूर्व बयान स्वैच्छिक और सुसंगत है, तो इसके आधार पर दोषसिद्धि दर्ज करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है।

इस महत्वपूर्ण निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में दर्ज किए गए मृत्युपूर्व बयान पर न्यायालय भरोसा कर सकती है, बशर्ते कि वह स्वैच्छिक और सुसंगत हो।

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Author: Deepak Mittal

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