75 दिनों तक अंग्रेजों की नींव हिलाता रहा ये आदिवासी विद्रोह, फिर भी इतिहास ने किया अनदेखा!

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Deepak Mittal

ताराचंद साहू बालोद जिले की कलम से,,

छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य बस्तर अनेकों विद्रोह हुए जो इतिहास के चर्चे में नहीं आया। वर्ष 1910 में हुए विद्रोह जिसे भूमकाल आंदोलन के रूप में भी जाना जाता है , जो कि बस्तर के रियासत में ब्रिटिश राज के खिलाफ एक आदिवासी विद्रोह था जिसका मुख्य कारण वनों के उपयोग के संबंध में ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियाँ थीं। ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने वनों को आरक्षित करना शुरू कर दिया था, जिससे केवल कुछ निगमों को ही वन संसाधनों का दोहन करने की अनुमति मिलती थी।आदिवासियों को अपनी आजीविका के साधनों के लिए वनों का उपयोग करने से रोक दिया गया, और कई बार, आदिवासी गाँवों का विस्थापन हुआ, जिससे औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ व्यापक आक्रोश पैदा हुआ।

14वीं से 18वीं शताब्दी तक मध्य भारत में माड़िया , मुरिया , दोरला , दुरुवा , हल्बा और भतरा गोंड जनजाति का हिस्सा हैं । वर्ष 1901 में आदिवासी की जनसंख्या 306,501के आसपास था। उस समय बस्तर के रियासत पर राजपूतों का शासन था, जो अंतिम काकतीय राजा प्रतापरुद्र द्वितीय के भाई अन्नामराज थे। बस्तर के आदिवासी अपनी आजीविका के रूप में प्राकृतिक संसाधनों के ऊपर बहुत अधिक निर्भर करतें थे । 1871 से, ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने विशेष रूप से प्राकृतिक संसाधनों क्षेत्रों में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया और 1908 में, जब आरक्षित वन नीति का विस्तार किया गया तो इस प्रणाली से एकत्रित वन उपज अक्सर रियायती दरों पर बेची जाती थी जिससे आदिवासी अक्सर भ्रष्ट वन अधिकारियों की दया पर शोषित मजदूर बन गए।आदिवासी अब अपनी ही जमीन पर किरायेदार बन गए और पूरे गांवों को पट्टे पर दे दिया गया।

इस विद्रोह का नेतृत्व गुंडाधूर ने किया था, यह विद्रोह अंग्रेजों द्वारा लगाए गए दमनकारी नीतियों, विशेष रूप से वन कानूनों और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ था।1910 के आदिवासी विद्रोह के प्रमुख सूत्रधार थे। गुण्डाधूर एक समान्य आदिवासी थे, लेकिन उसमें नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी। योजना गुंडा धुर के नेतृत्व में एक “स्वतंत्र क्रांतिकारी सरकार” स्थापित करना था । विद्रोह के नेतृत्व में दो रूपों का उपयोग किया एक ‌गुप्त रूप से, विद्रोह का नेतृत्व लाल करेंद्र सिंह ने किया, जो एक पूर्व दीवान थे और आदिवासियों के बीच बहुत लोकप्रिय थे। 6 फ़रवरी 1910 को विद्रोह शुरूआत हुआ, और 7 फरवरी को ही दंतेवाड़ा के पास गीदम में कई माड़िया गोंड नेताओं और गुंडा धुर ने एक सभा आयोजित की और 9 मार्च को, अभुज माड़ियाओं ने कमांडर ड्रूरी के नेतृत्व में छोटे डोंगर के पास ब्रिटिश भारतीय सेना पर हमला किया नारायणपुर में खदेड़ दिया गया।

भूमकाल विद्रोह को दबाने के लिए जयपुर और नागपुर अपराजेय टुकड़ियाँ को बुलाया गया तथा बस्तर के तत्कालीन राजा रूद्र प्रताप देव ने अंग्रेजी सेना की सहायता लेकर इस आंदोलन का दमन किया। ब्रिटिश शासन ने भूमकाल आंदोलन को स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा मानने की बजाय इसे जनजातीय विद्रोह तक सीमित कर दिया। 12 फरवरी, 1910 को अंग्रेजी सेना जगदलपुर पहुँची और आतंक व अत्याचार का परचम लहराया दिया।1910 के विद्रोही नेताओं में केवल गुण्डाधूर ही ऐसे थे जिन्हें न तो मारा जा सका और न ही पकड़ा जा सका।1899-1900 और 1907-1908 के भयानक अकालों ने लोगों की दयनीय स्थिति को और खराब कर दिया। ब्रिटिश शासन ने आंदोलन का कठोरतापूर्वक दमन किया और कई निर्दोष आदिवासी लोगों की कायरतापूर्वक हत्या कर दी गई। डेबरीधूर और उनके साथियों को 29 मार्च, 1910 को जगदलपुर के गोल बाजार में इमली के पेड़ पर फांसी दी गई। उस दिन से बस्तर के जगदलपुर में स्थित न्यायालय चौक का नामकरण 1910 के भूमकाल आंदोलन के सम्मान में ‘‘भूमकाल चौक’’ किया गया है। इस तरह यह आंदोलन 75 दिनों तक चलने के पश्चात समाप्त हो गया।

बस्तर के महान क्रांतिकारी शहीद गुंडाधुर को लोग आज भी बड़ी शिद्दत के साथ याद करते हैं। गुलामी की जंजीरों में जकड़े देश के हर हिस्से के तरह बस्तर भी अंग्रेजों की दासता से मुक्त होना चाहता था हालांकि उस जमाने में अंग्रेजों के अधीन राजवंश अंग्रेजों की मुखालफत करने की इजाजत नहीं देते थे। यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण आदिवासी विद्रोह था। जिसे कुचल दिया गया, लेकिन यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के खिलाफ आदिवासियों के प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया।

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Author: Deepak Mittal

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