दल्लीराजहरा।नवरात्रि की पावन अष्टमी-नवमी पर इस बार दल्लीराजहरा शहर में मां दुर्गा के भंडारों में पर्यावरण बचाने की मिसाल देखने को मिली। जहाँ पहले प्लास्टिक की कटोरियों और पानी पाउच का जमकर इस्तेमाल होता था, वहीं इस बार 85 फीसदी भंडारों में मिट्टी के बर्तन और दोना-पत्तल का प्रयोग किया गया।
दल्लीराजहरा शहर की 20 से अधिक समितियों ने मां दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित कर भंडारा आयोजन किया है। इन समितियों ने संकल्प लिया कि भंडारे में प्लास्टिक का उपयोग नहीं करेंगे, ताकि न तो पर्यावरण दूषित हो और न ही गायों को नुकसान पहुँचे।
थोक व्यापारी आकाश ,सौरभ कुमार ने बताया कि एक समिति औसतन 2 हजार दोना-पत्तल खरीद रही है। इस बार क्षेत्र में ही लगभग 25 हजार दोना-पत्तल बिक चुके हैं, जो पिछले साल की तुलना में 10 प्रतिशत अधिक है। इनकी आपूर्ति ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से हो रही है।
व्यापारियों का मानना है कि प्लास्टिक को जलाने से प्रदूषण बढ़ता है, जबकि दोना-पत्तल को आसानी से गड्ढों में डालकर नष्ट किया जा सकता है। यही वजह है कि इस नवरात्रि भंडारों में पर्यावरण मित्र बर्तनों की मांग बढ़ी है।भंडारा एक समुदायिक भोजन का आयोजन होता है जिसमें दोना-पत्तल (पलाश, केले के पत्ते आदि से बने) का उपयोग किया जाता है। प्लास्टिक-मुक्त दोना-पत्तल का उपयोग स्वच्छ और पर्यावरण-हितैषी भंडारों के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कुछ पारंपरिक तरीकों में, दोना-पत्तल और मिट्टी के बर्तन आज भी लोगों द्वारा बनाए जाते हैं।
दोना-पत्तल का चलन
धार्मिक उत्सव:
भंडारे, लंगर या सामुदायिक भोजन में प्रसाद बांटने के लिए दोना-पत्तल का चलन बहुत आम है।
पर्यावरण संरक्षण:पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले प्लास्टिक के बर्तन की जगह दोना-पत्तल का प्रयोग करने पर ज़ोर दिया जा रहा है। पलाश के पत्तों के दोना-पत्तल विशेष रूप से बेहतर माने जाते हैं।
पारंपरिक उत्पादन:
कुछ गांवों में लोग आज भी दोना-पत्तल और मिट्टी के कुल्हड़ बनाकर अपना परिवार चलाते हैं।
स्वच्छता का महत्व:
भंडारे के आयोजन में दोना-पत्तल का उपयोग करने के साथ-साथ उन्हें सही कूड़ेदान में फेंकने और कूड़े का उचित निपटान करने पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।
Author: Deepak Mittal









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