सुप्रीम कोर्ट ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि यह केवल नौकरी छोड़ने का मामला नहीं, बल्कि कर्मचारी का एक वैधानिक अधिकार है।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी 20 साल की सेवा पूरी करने के बाद 3 महीने का नोटिस देकर VRS के लिए आवेदन करता है और नियोक्ता इस अवधि में उसे अस्वीकार नहीं करता, तो सेवानिवृत्ति स्वतः प्रभावी मानी जाएगी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नोटिस अवधि समाप्त होने के बाद किया गया अस्वीकार वैध नहीं होगा।
यह फैसला एक बैंक की अपील पर आया, जिसमें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 2019 के आदेश को चुनौती दी गई थी। मामले में कर्मचारी ने 1983 में नौकरी जॉइन की थी और 2010 में VRS के लिए आवेदन दिया था।
निर्धारित नोटिस अवधि पूरी होने के बाद उसने काम बंद कर दिया, जबकि बैंक ने काफी देर से कार्रवाई की।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कर्मचारी विधिसम्मत तरीके से सेवानिवृत्त हो चुका था और उसे सभी सेवानिवृत्ति लाभ मिलने चाहिए। कोर्ट ने बैंक को निर्देश दिया कि तीन महीने के भीतर ब्याज सहित सभी बकाया राशि का भुगतान किया जाए।
Author: Deepak Mittal










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