(जे. के. मिश्रा ) बिलासपुर छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि पुलिस के सामने दिए गए बयान को अभियुक्त के खिलाफ अदालत में सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता। यह फैसला उस अपील पर दिया गया जिसमें निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए अभियुक्तों को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को खारिज करते हुए छह अभियुक्तों को रिहा करने का आदेश दिया।

मामला साल 2015 में हुई दोहरी हत्या और डकैती से जुड़ा है, जिसमें ट्रेलर चालक बोधन प्रसाद और उनके सहायक नीलेश कुमार की हत्या कर दी गई थी और उनके शवों को सूरजपुर जिले के जंगल में फेंक दिया गया था। निचली अदालत ने जनवरी 2018 में इस मामले में छह अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। पुलिस ने पहले गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की थी, लेकिन बाद में आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद उन पर हत्या और डकैती के आरोप लगाए गए।
ट्रायल कोर्ट ने पुलिस बयानों पर किया भरोसा
निचली अदालत ने दोषसिद्धि के लिए मुख्य रूप से पुलिस के सामने दिए गए बयानों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर भरोसा किया था। हालांकि, अभियुक्तों के अधिवक्ता ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस के सामने दिए गए बयान अस्वीकार्य होने चाहिए थे। यह धारा स्पष्ट रूप से कहती है कि पुलिस अधिकारियों के समक्ष दिए गए बयान अदालत में सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किए जा सकते।
परिस्थितिजन्य साक्ष्य का महत्व
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष पर्याप्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा, जिससे अभियुक्तों को दोषी ठहराया जा सके। कोर्ट ने कहा कि पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामलों में यह आवश्यक है कि साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी हो और संदेह की कोई गुंजाइश न हो।
अभियुक्तों की रिहाई का आदेश
हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य की श्रृंखला में कई महत्वपूर्ण कड़ियां गायब थीं, जिससे यह साबित नहीं हो सका कि आरोपित अपराध में दोषी थे। इसलिए, अदालत ने सभी छह अभियुक्तों की रिहाई का आदेश दिया।
Author: Deepak Mittal










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