उत्तर विदानी नवभारत टाइम्स 24 x7in संभाग ब्यूरो
महासमुंद,31मई। महासमुंद जिले के वामनसरा गांव में एक बरगद का 400 साल पुराना पेड़ है। यह उम्रदराज बरगद लगभग दो एकड़ जमीन पर अपनी जडें जमाया हुआ है। इस बरगद को लेकर लोगों में इस कदर जाागरुकता है कि वे इसे एक अमानत के रूप में संजोकर रखना चाहते हैं। लेकिन बरगद का यह बूढ़ा पेड़ धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोने लगा है।
इसे बचाने के लिए लोग कलेक्टर, जनप्रतिनिधियों से लगातार गुहार लगा रहे हैं। सभी ने पहले तो यही कहा कि उक्त बरगद को बचाने की हरसंभव कोशिश होगी। कई लोगों ने बड़ी-बड़ी बातें भी की। लेकिन उनमें से किसी ने भी इसकी सुधि नहीं ली। अभी भी ग्रीन केयर सोसायटी दिन रात एक कर दफ्तरों के चक्कर लगा रही है कि किसी तरह इस पेड़ को बचाया जा सके। गांव वामनसरा के बारे में जानकारी यह है कि यह गांव खुर्सीपार पंचायत का आश्रित ग्राम था।
गांव के लोगों के जीवन यापन का मुख्य जरिया कृषि एवं मजदूरी है। छोटे से इस गांव के प्रगतिशील कृषक हरिराम मोहन परिहार ड्रीप सिंचाई पद्धति एवं उन्नत तकनीकी खेती के माध्यम से सब्जी का उत्पादन करते हैं। गांव में जल व्यवस्था पेयजल हेतु 5 हेण्डपंप है। निस्तारी हेतु एक छोटा तालाब लगभग 7 एकड का, एक डबरी निजी लगभग 2 एकड़ का है जो गर्मी में सूख जाती हैं। गांव की खेतों में 22 कुंआ भी है जो गर्मी में सूख जाते हैं। भूजल स्तर पर बोरिंग करने पर 250 फ ीट में पानी मिलता है। आरंग से गोपालपुर ओडि़शा राष्ट्रीय राजमार्ग 353 के किनारे बसे इस ग्राम की दूरी बागबाहरा से खरियार रोड की ओर 16 किमी मुख्य मार्ग पर तथा लगभग 2 किमी अंदर बसा हुआ है। क्षेत्रवासी कहते हैं कि कोमासहान जमीनदार ठाकुर भानुप्रताप सिंह के पूर्वज चार सौ वर्ष पूर्व कोमाखान आए तथा उन्होंने बस्तर से बस्तरहीन माता को लाकर इस वट वृक्ष के नीचे स्थापित कर दिया।
वर्तमान में बरगद के पांच वृक्ष हैं जिसके नीचे कोमाखान जमीदार परिवार के पूर्वजों द्वारा स्थापित बस्तरहीन माता तथा ठाकुरदेव विराजमान है। इस वट वृक्ष की यह खास विशेषता है कि इसकी उम्र 4 सौ साल है। पुरातत्व खोज एवं पाडुलिपी संग्रहण कार्य में भारत सरकार पर्यावरण वन मंत्रालय द्वारा केंद्र प्रवर्तित गहन वन प्रबंधन योजना के लिए जारी मार्गदर्शिका में देव वनों के लिए सरंक्षण एवं संवर्धन के अनुस्वर तथा केम्पा निधि में उपलब्ध राशि का उपयोग कर राज्य सरकार द्वारा ऐसे पेड़ों के संवर्धन की योजना बनाई गई है। इसी संदर्भ में पर्यावरण संरक्षक विश्वनाथ पाणिग्रही ने शासन का ध्यान आकर्षित किया और पुरातत्व विभाग के सहयोग से इस विशाल वटवृक्ष की जानकारी सर्वेक्षण कर जुटा केन्द्र सरकार को भेजा। इसके बारे पुरातत्व खोजकर्ता विजय शर्मा ने भी गहरी रुचि दिखाई। विजय शर्मा एक वरिष्ठ शिक्षक हंैंं तथा पुरातात्विक खोज एवं पाण्डुलिपि संग्रह करने में उनकी गहरी अभिरूचि रहती है। उनके अनुसंधान के अनुसार गुप्तकाल में यह ग्राम बसा है। जिसके अवशेष मैदानों में जगह-जगह भूगर्भ में मिलते हैं।

सन् 1660 में ठाकुर भानुप्रतापसिंह के पूर्वज गुण्डीशाह, कोहंगीशाह का कोमाखान आगमन हुआ। विजय शर्मा ने बताया कि उनके आगमन के समय काल तथा उसके पूर्व अस्तित्व में रहे वृक्ष दोनों को आधार माना जाए तो वृक्ष की उम्र 500 वर्ष से अधिक होगी। उन्होंने बताया कि यह ग्राम गुप्तकाल में ब्राम्हणों को स्थानीय प्रचलित परम्पराओं के अनुसार सरा (दान) में दिया गया था। उसी के अनुरूप गांव का नामकरण बामनसरा (ब्राम्हणसरा)के नाम से हुआ।
विश्वनाथ पाणिग्रही बताते हैं कि इस वट वृक्ष इस को पतोरा डेम, नरसिंगनाथ तीर्थस्थल जाने वाले पर्यटकों के लिए पर्यटन कारिडोर बनाने की घोषणा तत्कालीन पर्यटन मंत्री मोहम्मद अकबर ने की थी। जिला प्रशासन, राज्य शासन तथा केम्पा अधिकारियों को इसके संरक्षण के लिए विस्तृत पत्र भेजा। सभी ने कहा कि 500 साल पुराने इस बुजुर्ग बरगद का संरक्षण जरूर होगा। लेकिन बातें थी बातों का क्या। अब यह वृक्ष अपनी डालियों को संभाल सकने में असमर्थ होते जा रहा है। फिर भी इसकी छाया के नीचे अनेक प्रकार के वृक्ष हैं। अनेक प्रजातियों के पक्षियों का आश्रय है। इसमें बहुत सी मधुमक्खियों के छत्ते हैं। इस तरह यह विशाल वृक्ष जैवविविधता एवं बनस्पति विविधता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।
ग्रीन केयर सोसायटी इस वृक्ष को हर साल रक्षा बंधन पर राखी बांधती है। यहां कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को वृक्ष बचाने का सन्देश देती है। ग्रीन केयर अध्यक्ष विश्वनाथ पाणिग्राही के नेतृत्व में ग्राम बामनसरा में ग्रामवासियों को पर्यावरण सरंक्षण हेतु पौधे लगाने, पौधों को सुरक्षित कर बड़ा करने तथा पूर्व के नैसर्गिक वृक्षों को बचाने हेतु आव्हान किया गया।
कोंदूराम, किशन ठाकुर, रिखीराम, भुनेश्वर साहू, मोहन, मनीष ठाकुर, उमेश यादव, गेंदराम, बल्ला ठाकुर सहित अन्य ग्रामवासी कहते हैं कि हमने इस बरगद को बचाने का संकल्प लिया है। दो एकड़ में फैली हुई है। ग्रामीणजन व क्षेत्रवासी लगातार पर्यटन के दृष्टि से स जगह को विकसित करने लगातार शासन.प्रशासन से मांग कर रहे हैं। किंतु अब तक ऐतिहासिक महत्व के स्थान पर पर्यटन को बढ़ावा देने और इस स्थान को विकसित करने का काम नहीं हो पा रहा है।
(अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर ग्रीन केयर सोसायटी इंडिया ने कोमाखान क्षेत्र के ग्राम बामनसरा स्थित इस वट वृक्ष के संरक्षण एवं इसे पर्यटन से जोडऩे के लिए पुन: मुहिम शुरू की। जिसके अंतर्गत संस्था के अध्यक्ष विश्वनाथ पाणिग्रही ने तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, वन मंत्री मोहम्मद अकबर, पर्यटन मंत्री ताम्रध्वज साहू, छत्तीसगढ़ बायोडाईवर्सिटी चेयरमैन पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी को पत्र लिखकर इसे संरक्षित करने तथा छत्तीसगढ़ पर्यटन से जोडऩे लिए अनुरोध किया। सभी ने कहा कि बेहतरीन तरीके इस बूढ़े पेेड़ का संरक्षण होगा।…लेकिन बाद में सब भूल गए। )
श्री पाणिग्रही बताते हैं कि वन विभाग महासमुंद ने इसे केम्पा योजना में शामिल भी किया। बामनसरा में बरगद वृक्ष रक्षा समिति बनाई गई। निजी भूमि होने के कारण भूमि स्वामी मिर्गिन बाई ने भूमि शासन को दान दिया। सम्पूर्ण कार्यवाहियां भी हुई। वन विभाग द्वारा तीन बार अलग-अलग पद्धति से नाप भी किया गया। लेकिन अभी तक सकारात्मक कार्य नहीं हो पाया। इतिहासकार विजय शर्मा, ग्रीन केयर के वरिष्ठ सदस्य विष्णु महानंद, डायरेक्टर ग्रीन केयर अमूजूरी विस्वनाथ दंतेवाड़ा, पंडित भागीरथी दुबे, छत्तीसगढ़ी कवि एवं साहित्यकार गोवर्धनलाल बघेल, योगेश बढ़ाई मोहगांव सहित ग्रीन केयर के सभी सदस्यों और ग्रामवासियों ने शासन से मांग की है कि शीघ्र ही इस वट वृक्ष को शासन संरक्षित कर पर्यटन में शामिल किया जाए।

Author: Deepak Mittal










Total Users : 8170192
Total views : 8198404