Global Economy 2025: वैश्विक अर्थव्यवस्था की साल 2025 में तस्वीर पूरी तरह से बदलती नजर आ रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के ताजा आंकड़ों ने दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों चीन और अमेरिका के बीच की आर्थिक खाई को और गहरा कर दिया है।
जहां एक ओर चीन अपने बेजोड़ निर्यात के दम पर दुनिया का सबसे बड़ा सरप्लस वाला देश बनकर उभरा है, वहीं दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कहा जाने वाला अमेरिका भारी घाटे के बोझ तले दब गया है।
करंट अकाउंट देश के लिए क्यों जरूरी
सरल शब्दों में कहें करंट अकाउंट किसी देश की आर्थिक सेहत का रिपोर्ट कार्ड होता है। जो देश ने दुनिया के साथ किए गए व्यापार (निर्यात-आयात), सेवाओं और बाहर से आने वाले पैसे (रेमिटेंस) के जरिए कितना कमाया और कितना खर्च किया। जब कमाई खर्च से ज्यादा हो। यह आर्थिक मजबूती, मजबूत करेंसी और विदेशी निवेश के भरोसे का प्रतीक होता है। वही जब खर्च कमाई से ज्यादा हो। यह दिखाता है कि देश अपनी जरूरतों के लिए विदेशी पूंजी पर निर्भर है।
चीन की 10 साल में 119% बड़ी छलांग
2025 के आंकड़ों में चीन का करंट अकाउंट सरप्लस आसमान छू रहा है। साल 2015 में चीन का सरप्लस 293 अरब डॉलर था, जो 2025 में बढ़कर 641 अरब डॉलर हो गया है। पिछले एक दशक में 119 प्रतिशत की जबरदस्त वृद्धि हुई है। विशेष रूप से पिछले एक साल में 51 प्रतिशत का उछाल साबित करता है कि वैश्विक सप्लाई चेन पर चीन की पकड़ आज उतनी मजबूत है, जितनी पहले थी। इसी आर्थिक ताकत के कारण अमेरिका जैसा सुपरपावर भी चीन से सीधा व्यापारिक युद्ध छेड़ने से पहले कई बार सोचता है।
अमेरिका बना घाटे का बड़ा महासागर
चीन के बाद जर्मनी 272 अरब डॉलर के साथ दूसरे और जापान 167 अरब डॉलर के साथ तीसरे स्थान पर है। हालांकि जापान के सरप्लस में पिछले साल के मुकाबले 14 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है, जो वहां की अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव का संकेत है। दूसरी ओर अमेरिका की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। साल 2015 में अमेरिका का करंट अकाउंट घाटा 408 अरब डॉलर था, जो 2025 तक तीन गुना बढ़कर 1.22 ट्रिलियन डॉलर के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।
छोटे देशों का लिस्ट में बड़ा कमाल
सरप्लस की रेस में सिर्फ बड़े देश ही नहीं, बल्कि छोटे देश भी आगे हैं:
नीदरलैंड्स: 126 अरब डॉलर (2015 से तीन गुना वृद्धि)
ताइवान और सिंगापुर: क्रमशः 122 अरब और 100 अरब डॉलर।
यूएई: 75 अरब डॉलर के साथ अपनी स्थिति मजबूत बनाए हुए है।
भारत की स्थिति और अन्य देशों का हाल
जो घाटा दर्शाता है कि अमेरिका अपनी खपत के लिए दूसरे देशों (खासकर चीन) के उत्पादों पर किस हद तक निर्भर हो चुका है। भारत के लिए भी चुनौतियां कम नहीं हैं। 2015 में भारत का करंट अकाउंट घाटा 22 अरब डॉलर था, जो बढ़कर 41 अरब डॉलर हो गया है। बढ़ती आबादी और विकास कार्यों के लिए कच्चे तेल और इलेक्ट्रॉनिक सामानों के भारी आयात ने घाटे को बढ़ाया है। युद्ध प्रभावित यूक्रेन की स्थिति सबसे दुखद है। 2015 में जो देश 2 अरब डॉलर के सरप्लस में था।
वैश्विक घाटा राजनीति के नए समीकरण
वह 2025 में 35 अरब डॉलर के घाटे में चला गया है। वहीं ऑस्ट्रेलिया 34 अरब डॉलर, कनाडा 32 अरब डॉलर और सऊदी अरब 26 अरब डॉलर जैसे देश भी वर्तमान में घाटे वाली अर्थव्यवस्थाओं की सूची में शामिल हैं। इन आंकड़ों के अनुसार आने वाले समय में वही देश दुनिया पर राज करेगा, जिसका निर्यात और विनिर्माण (Manufacturing) मजबूत होगा। चीन की बचत और अमेरिका का घाटा वैश्विक राजनीति के नए समीकरण लिख सकता है।
Author: Deepak Mittal










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