जनसेवा या व्यवसायीकरण है : राजनीति

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Deepak Mittal

जनसेवा या व्यवसायीकरण है : राजनीति

ताराचंद साहू की कलम से,,,,,

बालोद/ रायपुर ,,वर्तमान समय में राजनीति के मायने ही बदल गए हैं । आज हर कोई व्यक्ति राजनीति के जरिए अपने आप को प्रभावशील व कद बड़ा करने में लगे हुए हैं। इसके लिए चाहे उन्हें कुछ भी क्यों ही ना करना पड़े। अपनों को भी धोखा देने से बाज नहीं आते।आज की राजनीति इतनी गंदी हो चुकी है कि किसी को अपना नेता बोलने में भी शर्म आने लगता है। नेता वह होना चाहिए जिसे देखकर यह लगे कि यह वह इंसान है जो एक परिवर्तन लाने की क्षमता व कार्य कुशलता की हुनर रखता ,व समाज को आगे ले जाने की क्षमता रखता हो। राजनीतिक दो शब्दों से मिलकर बना है राज + नीति , राज का मतलब शासन और नीति का मतलब उचित समय और स्थान पर कार्य करने की कला। दूसरे शब्दों में कहे तो जनता के सामाजिक और आर्थिक स्तर को ऊंचा करना है राजनीति कहलाता है।

भारतीय लोकतंत्र की कल्पना करते हुए महात्मा गांधी सरदार पटेल जवाहरलाल नेहरू व अन्य नेताओं ने यह कभी नहीं चाहा था कि देश का नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथों में चला जाए जो सदचरित्र, सदाचार, संयम, नैतिकता आदि गुणों के विपरीत जीवन शैली रखते हो। जब एक अपराधी प्रवृत्ति के लोग संसद जाएंगे तो लोकतंत्र और राजनीति निश्चित रूप से प्रभावित होगी। चुनावी क्षेत्र में अपने अपराधिक प्रवृत्ति, धनबल चापलूसी के आधार पर संसद विधानसभा व क्षेत्र मंडल में पहुंच के संसदीय गरिमा को बेच खा जाते हैं।

राजनीति के सार को समझना है तो उसके आंतरिक तत्वों पर विचार करना और उसका विश्लेषण करना समाज को राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक बनती है। स्वतंत्रता के उपरांत भारत में राजनीतिक स्थिरता के प्रयास शीर्ष उन्मुख रही है। बढ़ती हुई जनसंख्या, उदारीकरण ,निजीकरण,राष्ट्रीय संप्रभुता के बदलते आयाम भारतीय राजनीति को विचलित किया व एक अलग प्रभाव समाज के बीच छोड़ा है। भारतीय राजनीति में सभी वर्ग के लिए देश की आत्मा व आवाज महिलाओं व ग्रामीणों को स्वशासन का अधिकार भारतीय लोकतंत्र में दिए जाते हैं। जन कल्याणकारी योजनाओं राज्य की अवधारणा बच्चों,वृद्धो और सभी वर्गों के व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराई जाती है।

आज के समय में राजनीति में जाना एक तरह का व्यवसायीकरण सा हो गया है। जहां सत्ता पाने की लालसा में एक झुंड में राजनीति करने से भी गुरेज नहीं करते। किसी भी इंसान को अपनी राजनीति की स्थिरता बनाए रखने के लिए अपने बड़े नेताओं के चापलूसी, चाटुकारिता और पद प्रलोभन आदि सभी प्रकार के कार्य किए जाते हैं। किसी ने सही कहा है राजनीतिक वैश्या के समान है जो हर बार एक अधर लबो पर लगता है। राजनीति में कब कहां किसको धोखा तथा किसी के राजनीति भविष्य समाप्त किया जाता है या किसी को पता नहीं चलता है। वर्तमान समय में राजनीतिक दलों के लोगों में नेतृत्व क्षमता, कार्य कुशलता को परखने में उनकी खुद की क्षमता भंग हो चुकी है। वह ऐसे दलदल में फंसे हैं जहां चारों गद्दारों, जयचंदो, चापलूस लोग भरे पड़े हैं। जिससे समाज व देश को एक कुशल नेतृत्व क्षमता और लीडरशिप योग्य व्यक्ति की चुनाव करने में परेशानी होती है।

भारत जैसे दुनिया के विशालतम लोकतांत्रिक देश में राजनीति, कार्यकारी व न्यायिक सत्ता के कुर्सी पर बैठे लोगों को प्रचुर मात्रा में शक्तियां प्रदान करती है। भ्रष्टाचार का जन्म कहीं ना कहीं सत्ता लोलुपता का ही परिणाम होता है। सत्ता की भूख जब भी अपनी हदें पर की है तो वह एक अभूत ताकत, बेशुमार संपत्ति सबको समेट लेना चाहती है। गरीबों के आवास, पानी, बच्चों की स्कूली शिक्षा, रोजगार, विकास व अन्य कार्य से कोई मतलब नहीं रखता है।वर्तमान समय में आज के पढ़े-लिखे युवा पीढ़ी को यह सोचना और समझने की जरूरत है कि हमें अपने आने वाले व देश की भविष्य को के लिए किस प्रकार के नेता और लीडरशिप की जरूरत है जो देश के सर्वांगीण विकास व समृद्धि में बेहतर हो ताकि हमें एक सशक्त विकसित समाज और देश का निर्माण करने में अपनी सहभागिता का दायित्व निभा सके। अपने मताधिकार का सही उपयोग कर देश को मजबूत लोकतंत्र निर्माण में सहयोग करें,,
ताराचंद साहू की कलम से

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Author: Deepak Mittal

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