निर्मल अग्रवाल ब्यूरो प्रमुख मुंगेली 8959931111
सरगांव- सरगांव के आदि शक्ति महामाया मंदिर में शारदीय नवरात्रि का समापन ज्योत-जवारा के भव्य विसर्जन के साथ हुआ, जहां भक्ति, शक्ति और श्रद्धा का अनोखा माहौल देखने को मिला। जसगीत सेवा मंडली की अगुवाई में निकली शोभायात्रा ने पूरे नगर को उत्साह से भर दिया, और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ ने हर गली-मोहल्ले में जोरदार स्वागत कर इस पर्व को यादगार बना दिया।

नवरात्रि के नौ दिनों तक मंदिर में श्रद्धालुओं ने आदि शक्ति महामाया देवी की पूजा-अर्चना, व्रत, आरती और कीर्तन के माध्यम से अपनी गहरी आस्था प्रकट की। इस दौरान मंदिर परिसर में रोजाना भजन-कीर्तन के कार्यक्रम आयोजित हुए, जिसमें स्थानीय कलाकारों और भक्तों ने सक्रिय भागीदारी की, जो समुदाय को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

महाअष्टमी के दिन कन्या पूजन और हवन की विशेष रस्में संपन्न हुईं, जहां छोटी-छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर पूजा की गई, उन्हें भोजन, फल और उपहार दिए गए, तथा हवन से पवित्र वातावरण बना। नवमी के दिन मंदिर से ज्योत-जवारा की परंपरागत शोभायात्रा निकाली गई, जो नगर के मुख्य मार्गों, बाजारों, गलियों और मोहल्लों से गुजरते हुए राधाकृष्ण मंदिर तालाब पहुंची, जहां विधि-विधान से विसर्जन किया गया।
शोभायात्रा के दौरान हर घर में पूजा-अर्चना कर फूलों की वर्षा, आरती और मिठाइयों का वितरण किया गया, जिससे पूरा वातावरण उत्सवी, हर्षोल्लास और सकारात्मक ऊर्जा से भर गया।हरी कीर्तन सेवा मंडली द्वारा प्रस्तुत देवी जसगीत ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना दिया, और श्रद्धालु नाचते-गाते शोभायात्रा में शामिल हुए, जिससे सामूहिक उत्साह का अद्भुत दृश्य उत्पन्न हुआ।
यह उत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और समुदाय की मजबूती को दर्शाता है। नवरात्रि जैसे पर्व समाज को जोड़ने, सद्भावना बढ़ाने और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने का बड़ा माध्यम साबित होते हैं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां ऐसी परंपराएं सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं।

इस अवसर पर मंदिर के पुजारी पं. ओमप्रकाश तिवारी, समिति के पदाधिकारी,और बड़ी संख्या में ग्रामवासी उपस्थित रहे, जिन्होंने मिलकर इस कार्यक्रम को सफल और सुरक्षित रूप से संपन्न कराया। इस अवसर पर महामाया मंदिर विकास समिति के अध्यक्ष शिव पांडे ने कहा कि “यह उत्सव हमारी सांस्कृतिक एकता को मजबूत करता है और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ता है। ऐसे पर्व न केवल आस्था बढ़ाते हैं, बल्कि समुदाय में सद्भावना, सहयोग और सांस्कृतिक जागरूकता को भी प्रोत्साहित करते हैं, जो हमारे सामाजिक ताने-बाने को मजबूत बनाते हैं।”
Author: Deepak Mittal










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