कुंज विहार कॉलोनी में जिम और क्रिकेट टर्फ के शोर से रहवासी परेशान, प्रशासन से कार्रवाई की मांग..

Picture of Deepak Mittal

Deepak Mittal

राजनांदगांव : कुंज विहार कॉलोनी के रहवासी इन दिनों जिम और रूफटॉप क्रिकेट टर्फ से होने वाले अत्यधिक शोर के कारण बेहद परेशान हैं। रहवासियों ने प्रशासन को शिकायत पत्र सौंपकर तत्काल कार्रवाई की मांग की है।

कुंज विहार कॉलोनी के निवासी लंबे समय से शोर-शराबे की इस समस्या से जूझ रहे हैं। कॉलोनी के पास स्थित एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में संचालित बॉडी टेक जिम में सुबह 5 बजे से लेकर रात 12 बजे तक तेज़ आवाज़ में म्यूजिक बजाया जाता है, जिससे लोगों की दिनचर्या और मानसिक शांति प्रभावित हो रही है।

इसके अलावा, इसी कॉम्प्लेक्स की चौथी मंज़िल पर एक रूफटॉप क्रिकेट टर्फ भी संचालित किया जा रहा है, जहां देर रात तक क्रिकेट खेला जाता है। इस दौरान तेज़ आवाज़ में लोगों का हल्ला और बल्ले-गेंद की आवाज़ से रहवासियों की नींद उचट जाती है।

कॉलोनी की रहवासी  ने बताया कि हम इस कॉलोनी में सालों से रह रहे हैं, लेकिन अब हालात बदतर हो गए हैं। मेरे वृद्ध पिता की तबीयत खराब रहती है, पत्नी माइग्रेन से पीड़ित हैं, और बच्चों की पढ़ाई पर भी असर पड़ रहा है। हमने प्रशासन से कई बार शिकायत की, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।”

रहवासियों का कहना है कि इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने प्रशासन से कई बार गुहार लगाई है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

रहवासियों की मांग है कि जिम और क्रिकेट टर्फ में ध्वनि विस्तारक यंत्रों के उपयोग को नियंत्रित किया जाए और रात 10 बजे के बाद शोरगुल पर सख्त पाबंदी लगाई जाए।

गौरतलब है कि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत शोर प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 लागू किए गए हैं। इन नियमों के अनुसार –

रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक ध्वनि विस्तारक यंत्रों का उपयोग प्रतिबंधित है।

जिम और रेस्टोरेंट जैसे संस्थानों में शोर स्तर 65 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए।

यदि यह इलाका रिहायशी क्षेत्र में आता है, तो रात के समय ध्वनि स्तर 45 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए।

यदि कोई भी संस्था या व्यक्ति शोर सीमा का उल्लंघन करता है, तो धारा 15, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत 5 साल की जेल या 1 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले पर क्या कार्रवाई करता है। यदि जल्द ही कोई हल नहीं निकला, तो रहवासी राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) या उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर मजबूर हो सकते हैं,,

Deepak Mittal
Author: Deepak Mittal

Leave a Comment

Leave a Comment