छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से एक अद्वितीय मामला सामने आया है, जहां एक महिला जज ने अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ खुद वकील बनकर लड़ाई लड़ी और न्याय पाया। सात साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद हाईकोर्ट ने उन्हें बहाल करने का आदेश दिया है।
मामला क्या है?
महिला जज आकांक्षा भारद्वाज को 2017 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। उनका आरोप था कि एक वरिष्ठ मजिस्ट्रेट द्वारा उनके साथ अनुचित व्यवहार किया गया। आकांक्षा ने इस मामले की शिकायत उच्चाधिकारियों से की थी, लेकिन जांच समिति ने उनकी शिकायत को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया। इसके आधार पर उन्हें विधि एवं विधायी विभाग ने बर्खास्त कर दिया।
बर्खास्तगी के बाद आकांक्षा भारद्वाज ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की और खुद ही अपने केस की पैरवी की। मई 2024 में सिंगल बेंच ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें वरिष्ठता सहित बहाल करने का आदेश दिया, हालांकि बैक वेजेस (पिछला वेतन) नहीं दिया गया।
2013 में शुरू हुआ था करियर
बिलासपुर के सरकंडा की रहने वाली आकांक्षा भारद्वाज का चयन 2012-13 में सिविल जज परीक्षा के माध्यम से हुआ था। उन्हें 2013 में दो साल की परिवीक्षा अवधि पर नियुक्त किया गया। प्रशिक्षण के बाद 2014 में उन्हें अंबिकापुर में स्वतंत्र प्रभार दिया गया। इस दौरान उनके साथ अनुचित व्यवहार की घटनाएं हुईं, जिनकी शिकायत उन्होंने उच्चाधिकारियों से की।
बर्खास्तगी और कानूनी लड़ाई
2017 में आंतरिक जांच समिति ने महिला जज की शिकायत को निराधार माना, जिसके बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। आकांक्षा ने बर्खास्तगी के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की। उन्होंने अपने केस में खुद वकील बनकर पैरवी की और सिंगल बेंच से अपने पक्ष में फैसला हासिल किया।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ विधि एवं विधायी विभाग ने अपील की। इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच में हुई। सुनवाई के बाद कोर्ट ने महिला जज को बहाल करने का अंतिम आदेश दिया। इसके बाद 3 दिसंबर 2024 को आकांक्षा भारद्वाज को महासमुंद में पोस्टिंग दी गई।
निष्कर्ष
यह मामला न्यायपालिका के इतिहास में एक मिसाल के रूप में सामने आया है, जहां एक महिला जज ने अपने अधिकारों के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और न्याय प्राप्त किया। उनका यह संघर्ष आने वाले समय में अन्य लोगों को भी प्रेरणा देगा।

Author: Deepak Mittal
