बालोद : भालू की कब्र से निकला सनसनीखेज सच ! पंजे गायब, रस्सी से बंधा शव-क्या वन विभाग तस्करों के साथ?…

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बालोद :  छत्तीसगढ़ के किल्लोबाहरा जंगल में जो कुछ हुआ, वह केवल एक भालू की मौत नहीं, बल्कि एक बड़े षड्यंत्र की ओर इशारा करता है! 24 फरवरी को मिले भालू के शव को बिना पोस्टमॉर्टम गुपचुप दफना दिया गया, और जब 27 दिन बाद उसे निकाला गया तो जो सामने आया, उसने पूरे सिस्टम को झकझोर कर रख दिया।

1 फीट खुदाई में मिले पंजे! 3 फीट नीचे सड़ा हुआ शरीर :
जब वन विभाग और पशु चिकित्सा विभाग की संयुक्त टीम ने शव को बाहर निकाला, तो सच्चाई का ऐसा भयावह चेहरा दिखा जिसने हर किसी के रोंगटे खड़े कर दिए। केवल 1 फीट खुदाई करने पर भालू के चारों पंजे अलग-अलग पड़े मिले और 3 फीट नीचे रस्सी से बंधा शरीर सड़-गल चुका था। सबसे बड़ा सवाल यही है-

* भालू के पंजे अलग क्यों थे?

* क्या उन्हें काटकर बाद में वापिस गड्ढे में गाड़ दिया गया?

* क्या यह वन विभाग और तस्करों की मिलीभगत है?

नर भालू के अंगों की अंतरराष्ट्रीय कीमत करोड़ों में :

विशेषज्ञों के अनुसार, नर भालू के गुप्तांग, पंजे, नाखून और दांत की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत करोड़ों रुपये तक होती है! भालू के शरीर के इन हिस्सों का उपयोग तंत्र-मंत्र, दवाइयों और अवैध व्यापार में किया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भालू के शरीर के कीमती अंग तस्करों को बेचे गए और मामला खुलने के बाद सबूतों को मिटाने के लिए शव को जल्दबाजी में दफना दिया गया?

*गोपनीयता या अपराध? वन विभाग की चुप्पी क्यों? :*
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बालोद वन विभाग के कर्मचारियों ने शव मिलने की सूचना उच्च अधिकारियों को नहीं दी और नियमों को ताक पर रखकर उसे दफन कर दिया। पोस्टमॉर्टम न कराना खुद अपराध की ओर इशारा करता है! अब जब मामला तूल पकड़ रहा है, तो वन विभाग के अधिकारी मीडिया से बच रहे हैं, फोन नहीं उठा रहे।

* वन मंडलाधिकारी बलभद्र सरोटे फोन नहीं उठाते!

* डौंडीलोहारा वन परिक्षेत्र अधिकारी केके साहू चुप्पी साधे बैठे हैं!

*फॉरेंसिक जांच से होगा खुलासा, लेकिन एक महीना देर क्यों? :* भालू के पंजे, त्वचा और आंतरिक अंगों के नमूने नेशनल फॉरेंसिक लैब (दिल्ली, हैदराबाद) भेजे गए हैं। लेकिन रिपोर्ट आने में एक महीना लगेगा। क्या यह देरी भी अपराधियों को बचाने की साजिश का हिस्सा है।

*भ्रष्टाचार का बड़ा खेल? हाई-लेवल जांच की मांग :* वन विभाग के अधिकारियों की संलिप्तता की आशंका गहराती जा रही है। प्रदेश की कई वन्यजीव संरक्षण संस्थाएं अब इस मामले को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) तक ले जाने की तैयारी कर रही हैं। वहीं, वन विभाग ने भी मामले की हाई-लेवल जांच के संकेत दिए हैं।

*जनता मांग रही जवाब! क्या यह लापरवाही थी या सुनियोजित अपराध? :* बालोद की जनता और वन्यजीव प्रेमी सच्चाई जानना चाहते हैं।

* अगर यह लापरवाही थी, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो!

* अगर यह साजिश थी, तो वन विभाग के भ्रष्ट तंत्र का पर्दाफाश हो!


भालू के साथ जो हुआ, वह न सिर्फ जंगल के न्याय के खिलाफ है बल्कि पूरे वन्यजीव संरक्षण कानून (1972) और पर्यावरण प्रबंधन की पोल खोलता है। अब सवाल यह है-क्या वन विभाग के भ्रष्ट अधिकारी बच जाएंगे? या यह केस छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े वन्यजीव तस्करी घोटाले का पर्दाफाश करेगा?…

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Author: Deepak Mittal

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