रायपुर: मौत के बाद हर व्यक्ति सम्मानजनक विदाई और अपनों के कंधे की उम्मीद करता है, लेकिन राजधानी रायपुर में बीते 13 वर्षों में 4 हजार से अधिक ऐसे शव मिले, जिन्हें अपने परिजनों का साथ नसीब नहीं हुआ। ये सभी अज्ञात शव के रूप में अस्पतालों तक पहुंचे और बाद में उनका कफन-दफन समाजसेवियों की मदद से किया गया।
संस्थान के संचालक सैय्यद जमीर अली के अनुसार, रायपुर संभाग में एम्स रायपुर, पंडरी स्थित अस्पताल और डॉ. भीमराव अंबेडकर स्मृति चिकित्सालय में आने वाले अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार उनकी संस्था द्वारा किया जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2013 से अब तक लगभग 4,000 से अधिक अज्ञात शव बरामद हुए हैं।
केवल 8 मामलों में पहुंचे परिजन
हैरानी की बात यह है कि इन हजारों मामलों में पिछले 13 वर्षों में केवल आठ लोगों के परिजन ही अपने लापता सदस्य की तलाश करते हुए यहां तक पहुंच पाए। बाकी सभी शवों की पहचान नहीं हो सकी।
शिनाख्त प्रणाली पर उठे सवाल
इतनी बड़ी संख्या में शवों का अज्ञात रह जाना पुलिस की शिनाख्त प्रक्रिया और मिसिंग पर्सन ट्रैकिंग सिस्टम पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं, बल्कि किसी के बेटे, पिता या भाई की अधूरी कहानी हैं, जिनका परिवार शायद आज भी उनकी घर वापसी की आस लगाए बैठा है।
कब्र से निकालकर सौंपे गए शव
जिन आठ मामलों में परिजन सामने आए, वे बेहद भावुक और जटिल रहे। महीनों या वर्षों बाद जब स्वजनों को अपने लापता सदस्य की मौत की जानकारी मिली, तो प्रशासन की कानूनी प्रक्रिया के तहत कब्रिस्तान से शवों को निकालकर अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को सौंपा गया।
लावारिस लाशों का यह बढ़ता अंबार शहर की सामाजिक संवेदनशीलता और तंत्र की चुनौतियों की ओर इशारा करता है, जहां हजारों लोग पहचान और अपनेपन से वंचित होकर इस दुनिया से विदा हो गए।
Author: Deepak Mittal









