सरकारें  बदली लेकिन व्यवस्था पहले जैसे ही, आखिर क्यों नहीं दिया जा रहा प्रशासन द्वारा इस ओर ध्यान..

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बीजापुर : आदिम जाति कल्याण विभाग के आश्रम शालाओं में तथा शिक्षा विभाग के रेसीडेंसियल स्कूल (पोटा केबिनों) में बहुत सारे शिक्षक विगत 15 सालों से अधीक्षक के पद में काबिज हैं। इनमें से प्रमुखतः रघुवीर भारती पोस्ट मैट्रिक बालक छात्रावास गोपालपटनम, श्रीमती देवकी दम्मूर कन्या पोस्ट मैट्रिक कन्या छात्रावास भोपालपटनम, हुगाराम गोंदी बालक आश्रम गुन्लापेटा, श्रीमती शारदा कोण्ड्रा कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय भोपालपटनम, श्रीमती नरसू गोटे कन्या आश्रम पेगडापल्ली, कृपाल सिंह मरकाम  बालक आश्रम करकावाया, श्रीमती शशीकला वल्वा कन्या माध्यमिक आश्रम शाला सण्ड्रा, मीनाक्षी यालम कन्या माध्यमिक आश्रम शाला दुद्देड़ा में पदस्थ हैं।

प्रति पांच साल में सरकारें बदल रही हैं, किन्तु ये नही बदल रहे। इनके आश्रम/छात्रावासों में न ही शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, और न ही इन संस्थाओं के बच्चे नवोदय, एकलव्य विद्यालयों के लिये अथवा किसी प्रतिभा खोज परीक्षा के लिये चयनित हुए हैं। फिर भी इनके प्रति शासन-प्रशासन मेरहबान क्यों हैं।

समझ से परे है। एक तरफ विकासखण्ड भोपालपटनम में कुल 31 आश्रम-छात्रावास एवं 06 पोटा केबिन 01 कस्तूरबा विद्यालय संचालित हो रहे हैं। जिनमें लगभग 4000 से अधिक बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, किन्तु इनमें से केवल 03 आश्रम जिनमे एड़ापल्ली, अन्नापुर, पीलूर के ही जहां अध्ययनरत 150 बच्चों की शैक्षणिक गुणवत्ता का स्तर दिखाई पडता है, जहां से बच्चे नवोदय, एकलव्य एवं जवाहर उत्कर्ष जैसे विद्यालयों के लिये चयनित होते हैं।

शेष आश्रम शालाओं में एक भी विद्यार्थी चयनित नही होते हैं। इन आश्रम-छात्रावासों के अधीक्षकों का कार्य केवल बच्चों के शिष्यवृत्ति को डकार जाना रहता है। पोटा केबिनों में जब भी कोई अधिकारी निरीक्षण करने जाता है, तो वहां 50 से 60 प्रतिशत बच्चे उपस्थित मिलते हैं। बाकी बच्चे न ही आश्रम में पड़ते हैं, और न ही उनके ग्राम के स्कूल में पड़ते हैं। वे बच्चे शाला त्यागी एवं अप्रवेशी भी नही कहलाते हैं। क्योंकि उनका नाम आश्रमों में दर्ज रहता है। वास्तव में वे बच्चे ही शाला त्यागी होते हैं।

उनका उद्धेश्य केवल  अनुपस्थित बच्चों का हाजिरी डालकर राशि का गबन करना होता है। कई शिक्षक, नेताओं तथा अधिकारियों की चापलूसी करके अधीक्षक का पद हासिल कर लेते हैं, और साल दर साल अधीक्षक पद पर काबिज रहकर आदिवासी बच्चों का निवाला छीन कर खा रहे हैं।

शासन एवं प्रशासन को चाहिये कि अधीक्षकों की नियुक्ति करते समय शिक्षा की गुणवत्ता के साथ-साथ बच्चों की सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखकर किया जाना होगा। सरकारें बदल रही हैं, किन्तु व्यवस्था जैसी की तैसी बनी हुई है। अनुभव एवं काबीलियत के हिसाब से शिक्षकों को अधीक्षक का दायित्व दिया जाना चाहिए। जिससे बच्चों का भविष्य में सुधार हो सके।

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Author: Deepak Mittal

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