अशोक आकाश
गीत विधा-गीत ताटंक छंद, मात्रा 16,14
पतझड़ बीता वसंत आया, नवल कुसुम इतराते हैं।
धूप-छॉंव सबके जीवन में, सुख दुःख आते जाते हैं।।
सुख में ज्यादा खुश न होना, दुख में मत आपा खोना।
कठिन डगर है कॉंटे कंकड़, निखरे वह तपता सोना।।
स्वार्थ भरी दुनिया की गलियॉं, झूठे रिश्ते-नाते हैं…
धूप छाँव सबके जीवन में, सुख दुख आते जाते हैं…
सुख का बड़ा समंदर होता, दुख घड़ियॉं होती छोटी।
धीरज संयम धार चले वो, लाँघ समंदर पा मोती।।
शीतल जल बारिश हुई कभी, अंगारे बरसाते हैं…
धूप छाँव सबके जीवन में, सुख दुख आते जाते हैं…
चिंता तज दो कर्मदण्ड की, दुख के दिन आयेंगे ही।
जब सुख भोगा खुशी मिली थी, दुख बदली छायेंगे ही।।
सूरज तो तपता ही रहता, चन्द्र ग्रहण लग जाते हैं…
धूप छॉंव सबके जीवन में, सुख दुख आते जाते हैं..
*(दीपक मित्तल नवभारत टाइम्स 24*7 in प्रधान संपादक रायपुर)*
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Author: Deepak Mittal














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