कंप्यूटर से ज्यादा खुद पर भरोसा
29 मई, 2006 को चेन्नई के तेलुगू परिवार में पैदा हुए डी गुकेश दिमागी कसरत के इस खेल के काफी चतुर खिलाड़ी हैं। वह आक्रामक के साथ ही रक्षात्मक और शांति से खेलने में माहिर हैं। कोच विष्णु प्रसन्ना कहते हैं कि इस बच्चे ने सामान्य बच्चों की तरह अपना बचपन नहीं जिया है। अन्य खिलाड़ी खेल के बीच में थोड़ा भी गैप मिलने पर मस्ती के मूड में आ जाते हैं, लेकिन गुकेश एक मैच खत्म होते ही दूसरे की तैयारी में जुट जाते हैं। अन्य खिलाड़ी ज्यादातर कंप्यूटर पर निर्भर रहते हैं, जबकि गुकेश कंप्यूटर का सहारा लेने के साथ ही अपनी खुद की रणनीति पर अधिक भरोसा करते हैं।
नौ साल में एशिया चैंपियन
डॉ. रजनीकांत ने अपने इकलौते बेटे गुकेश का दाखिला चेन्नई के वेलेमल विद्यालय में करवाया। उन्होंने लगभग सात साल की उम्र में गुकेश को समर कैंप में भेजा। कैंप के दौरान कई खेलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा था, लेकिन गुकेश चेस बोर्ड की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे थे। गुकेश ने अपने स्कूल में ही शतरंज सीखना शुरू किया। दो साल बाद ही वह अंडर-9 स्कूल टूर्नामेंट के एशिया चैंपियन बन गए। इसके बाद पिता ने विश्वनाथन आनंद की वेस्टब्रिज आनंद चेस एकेडमी में उन्हें दाखिला दिला दिया। 2017 में पिता ने डॉक्टरी की प्रैक्टिस छोड़ दी और माइक्रोबायोलॉजिस्ट मां पद्मा लक्ष्मी ने घर संभाला।
टर्निंग पॉइंट
डी गुकेश ने मैग्नस कार्लसन को विश्व चैंपियन बनते हुए देखकर ही शतरंज में कॅरिअर बनाने का निश्चय किया था। 2022 में चेन्नई में हुए 44वें शतरंज ओलंपियाड में टॉप बोर्ड पर खेलने वाले गुकेश एकमात्र भारतीय खिलाड़ी थे। उन्होंने यहां स्वर्ण पदक जीता और कार्लसन ने कांस्य पदक। पुरस्कार वितरण के दौरान जब गुकेश को गोल्ड मेडल से नवाजा जा रहा था, तो कार्लसन पदक लेने के लिए पोडियम पर नहीं पहुंचे। यह टूर्नामेंट गुकेश के जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
सारे रिकॉर्ड ध्वस्त
डोम्माराजू गुकेश 12 वर्ष 7 माह 17 दिन की उम्र में ग्रैंडमास्टर बने। अप्रैल, 2024 में कनाडा के टोरंटो में हुए फिडे कैंडिडेट शतरंज का खिताब जीतकर गुकेश ने रूस के गैरी कास्परोव का 40 वर्ष पहले बनाया रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया। कास्परोव ने फिडे कैंडिडेट खिताब 20 वर्ष की उम्र में जीता था, जबकि गुकेश ने महज 17 वर्ष की उम्र में ही यह उपलब्धि हासिल कर ली। वहीं अब वह सबसे कम उम्र में विश्व चैंपियन बनने वाले पहले खिलाड़ी बन गए हैं। कास्परोव 1985 में 22 साल की उम्र में, जबकि गुकेश 18 साल की उम्र में ही विश्व चैंपियन बन गए। विश्वनाथन आनंद के बाद भारत के लिए विश्व चैंपियनशिप जीतने वाले गुकेश दूसरे खिलाड़ी हैं।
कास्परोव ने बताया ‘भूकंप’
गुकेश ने फिडे कैंडिडेट खिताब जीतकर विश्वनाथन आनंद और कार्लसन जैसे शतरंज के पंडितों के पूर्वानुमान को भी गलत साबित कर दिखाया। आनंद ने कहा था कि फिडे कैंडिडेट में 2026 तक तो शायद ही कोई भारतीय यह खिताब जीते। लेकिन गुकेश ने न केवल फिडे कैंडिडेट में जीत का परचम लहराया, बल्कि विश्व चैंपियनशिप भी अपने नाम कर लिया। गुकेश के हाथों खुद का रिकॉर्ड ध्वस्त होने से खुश रूस के कास्परोव ने तो उन्हें ‘भारतीय भूकंप’ तक कह डाला।
पानीपुरी, टिंकल और बाहुबली-2
गुकेश की पसंदीदा जगह मलयेशिया है। इसे वह ‘धरती पर स्वर्ग’ कहते हैं। उन्हें चाट और पानीपुरी खाना बेहद पसंद है। गुकेश को शतरंज के अलावा क्रिकेट और बैडमिंटन खेलने का भी शौक है। वीकेंड पर या अपने खाली समय में वह यू-ट्यूब पर मीम्स और ‘ट्राई नॉट टू लाफ’ के वीडियो देखना पसंद करते हैं। बाहुबली-2 उनकी सबसे पसंदीदा फिल्म और टिंकल पसंदीदा कॉमिक्स है।
एक दिन में 70 पजल्स
गुकेश के पहले कोच भास्कर वी बताते हैं कि गुकेश को वह शतरंज के 70 पजल्स हल करने के लिए देते थे और सुबह 9:30 से शाम 7:30 बजे तक लगातार अभ्यास करना होता था। गुकेश जब सिर्फ 12 वर्ष की उम्र में ग्रैंडमास्टर बने, तब उन्होंने 16 महीने की अवधि में 13 देशों में 30 टूर्नामेंटों में 276 गेम्स खेले थे। विश्व विजेता बनने के लिए गुकेश ने पांच बार के विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद, पोलैंड के ग्रेजगोर्ज गजेवस्की के अलावा 2011 की विश्व विजेता भारतीय क्रिकेट टीम और पेरिस ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता भारतीय हॉकी टीम के साथ रणनीतिक भूमिका निभाने वाले पैडी अप्टन की भी मदद ली।

Author: Deepak Mittal
