दिल्ली से लौटे दर्द के दरिया: नक्सल हिंसा के जख्म लेकर बोले पीड़ित – ‘चार दशक में लहूलुहान हो गया बस्तर

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रायपुर।
देश की राजधानी दिल्ली से छत्तीसगढ़ लौटे नक्सल हिंसा के पीड़ितों ने अपना दर्द साझा किया है। इन पीड़ितों ने बताया कि कैसे चार दशक से अधिक समय से बस्तर की धरती पर लाशों का सन्नाटा पसरा हुआ है — नक्सल हिंसा ने न केवल हजारों आदिवासियों और पुलिसकर्मियों की जान ली, बल्कि उनकी जिंदगियों की बुनियाद भी हिला दी।

????️ “हमारी चीखें कोई नहीं सुनता”
बस्तर शांति समिति के सदस्य जयराम दास ने कहा –

“जब आम जनता ने नक्सलियों के खिलाफ सलवा जुडूम आंदोलन छेड़ा, तो कुछ लोगों ने उसे भी कुचलने का प्रयास किया। हमारी शांति की पुकार को बंदूक की आवाज में दबा दिया गया।”

⚖️ बी. सुदर्शन रेड्डी को लेकर विरोध
पीड़ितों ने पूर्व जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी को उपराष्ट्रपति पद का समर्थन न देने की सांसदों से अपील की है।
उन्होंने आरोप लगाया कि 2011 में बुद्धिजीवियों के दबाव में रेड्डी ने सलवा जुडूम पर बैन लगा दिया था, जो नक्सलियों के खिलाफ लोगों की आवाज थी।

???? नक्सल हिंसा की असली तस्वीर

  • सियाराम रामटेके (कांकेर):

    “9 अक्टूबर 2022 को खेत में था, तभी नक्सलियों ने गोली चला दी। मौत सामने खड़ी थी… पर बच गया।”

  • कोंडागांव का एक अन्य पीड़ित:

    “2014 में बाजार में भाई के साथ था… नक्सलियों ने हमला कर दिया। मैं घायल हुआ, भाई को पकड़कर मार डाला।”

????️ “बस्तर शांति चाहता है”
पीड़ितों का कहना है कि “बस्तर छत्तीसगढ़ की आत्मा है” और वहां की जनता केवल शांति और सम्मान चाहती है।

“हमें विकास चाहिए, लाशें नहीं। हमें शिक्षा चाहिए, विस्फोट नहीं।”

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Author: Deepak Mittal

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