गोरखपुर।
कहते हैं, जब आधुनिक विज्ञान किसी बीमारी या स्वास्थ्य समस्या का समाधान न खोज पाए, तो नजरें प्रकृति की ओर मोड़ लेनी चाहिए। भारतीय प्रकृति और आयुर्वेद में ऐसे अनगिनत वनस्पति और औषधीय पौधे हैं, जो न केवल बीमारियों को जड़ से मिटाते हैं, बल्कि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाते हैं। डॉ. सरिता चौहान, प्रवक्ता हिंदी, पीएम श्री एडी राजकीय कन्या इंटर कॉलेज, गोरखपुर, ने दो प्रमुख प्राकृतिक औषधियों पर प्रकाश डाला — बेल (बिल्व पत्र) और कनेर।
बेल: धर्म, आयुर्वेद और विज्ञान का संगम
बेल का वैज्ञानिक नाम Aegle marmelos है। यह पौधा न केवल धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाता है, बल्कि इसकी औषधीय महत्ता भी अपार है। इसे शांडिल्य यानी पीड़ा निवारक भी कहा जाता है। इसकी पत्तियों से लेकर फल, पुष्प, छाल और जड़ तक सबकुछ औषधीय गुणों से भरपूर है।
बिल्व पत्र में विटामिन C, बीटा कैरोटिन, थायमिन, राइबोफ्लेविन, टैनिन, फाइबर, कैल्शियम, फॉस्फोरस, प्रोटीन और आयरन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसके सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसके एंटीफंगल और एंटी-पैरासाइट गुण इसे और अधिक उपयोगी बनाते हैं।
कनेर: सुंदरता में छिपा उपचार
कनेर का वैज्ञानिक नाम Thevetia peruviana है और इसे अंग्रेजी में Yellow Oleander तथा Be-still Tree के नाम से जाना जाता है। इसके फूल सफेद, पीले, गुलाबी और लाल रंगों में पाए जाते हैं। संस्कृत में इसे पीत करवीर तथा दिव्य पुष्प कहा गया है।
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में कनेर को विभिन्न नामों से जाना जाता है:
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उड़िया: कोनयार फुल
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कन्नड़: कडुकासी
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तमिल: पचैयलरी
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बंगाली: कोकील फुल
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मराठी: पिंवलकंडवेर
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मलयालम: पच्चारली
यह एक झाड़ी जैसा पौधा है, जिसके सभी हिस्से — पत्ते, फूल, बीज, छाल, जड़ — औषधीय उपयोग में आते हैं। हालांकि इसके अधिकतर भाग विषैले होते हैं, इसलिए इसे खाने से ज्यादा बाह्य रूप से लगाने में प्रयोग किया जाता है। यह तेल में पकाकर त्वचा रोगों में लगाया जाता है, संक्रमण को रोकने में मदद करता है और सूजन कम करता है।
लेखिका:
डॉ. सरिता चौहान
प्रवक्ता हिंदी
पीएम श्री एडी राजकीय कन्या इंटर कॉलेज, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)

Author: Deepak Mittal
