परंपरा और आस्था का संगम: दल्लीराजहरा सहित क्षेत्र में धूमधाम से मनाया गया पोला पर्व
दल्लीराजहरा।लोकोत्सव और परंपरा के प्रतीक पोला पर्व को दल्लीराजहरा सहित आसपास के ग्रामीण और शहरी अंचलों में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। ग्रामीण अंचलों से लेकर नगर की गलियों तक परंपरागत रौनक देखते ही बन रही थी। खेतिहर समाज के इस विशेष पर्व में बच्चों ने मिट्टी और लकड़ी से बने नांदिया-बैल सजाकर शोभायात्रा निकाली और गीत-संगीत के साथ गली-गली घूमते नजर आए।

दल्लीराजहरा सहित क्षेत्र में सुबह से ही घर-आंगनों में उत्साह का वातावरण रहा। महिलाओं ने पारंपरिक व्यंजन बनाए, वहीं किसानों ने अपने बैलों को नहलाकर, सजाकर और पूजन कर विशेष रूप से आराधना की। जगह-जगह पर बच्चों ने बैलों की नांदिया घुमाकर पर्व का उल्लास बढ़ाया। ग्रामीण अंचल में ढोल-नगाड़ों की थाप और पारंपरिक गीतों की गूंज ने माहौल को और भी जीवंत बना दिया।

क्यों मनाया जाता है पोला पर्व?
पोला पर्व मुख्यतः किसानों का त्योहार है। यह कृषि संस्कृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व माना जाता है। खेत जोतने और अन्न उत्पादन में बैलों की महत्ता को देखते हुए यह दिन विशेष रूप से उन्हें समर्पित होता है। इस अवसर पर बैलों की पूजा-अर्चना कर किसान उन्हें धन्यवाद देते हैं।
साथ ही, यह पर्व नई फसल की बुआई शुरू होने के पूर्व खेतिहर समाज के लिए मंगलकामना का संदेश लेकर आता है। बच्चों द्वारा सजाई गई नांदिया-बैल की झांकी भविष्य की कृषि परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रतीक है।

सामुदायिक एकजुटता का पर्व
दल्लीराजहरा नगर की गलियों और गांव की चौपालों में बच्चों की टोलियां गीत गाती और नांदिया-बैल घुमाती देखी गईं। वहीं, बुजुर्गों ने इस अवसर पर पोला पर्व की प्राचीन परंपराओं और इससे जुड़े धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व को साझा किया। यह पर्व न सिर्फ कृषि जीवन का उत्सव है बल्कि समाज में सामूहिकता और भाईचारे का संदेश भी देता है।
इस प्रकार दल्लीराजहरा सहित पूरे क्षेत्र में पोला पर्व परंपरागत विधि-विधान और उल्लास के साथ मनाकर ग्रामीण संस्कृति की जीवंत झलक देखने को मिली।
Author: Deepak Mittal










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