निर्मल अग्रवाल ब्यूरो 8959931111
बिल्हा-कार्तिकेय के द्वारा तारकासुर का वध होने पर उसके तीनों पुत्रों तारकाक्ष , कमलाक्ष, विद्युन्माली ने जब जल के अंदर समाहित होकर ब्रह्मा जी की तपस्या की और वरदान प्राप्त किया कि वे तीनों जब एक साथ होंगे तभी उनकी मृत्यु होगी अन्यथा उनकी मृत्यु नहीं होगी। वरदान प्राप्ति के पश्चात तीनों अलग-अलग दिशा में फैल कर जनमानस और देवताओं को परेशान करने लगे, उनका सिंहासन छीन लिया। सभी देवताओं, विष्णु और ब्रह्मा ने मिलकर भगवान शिव की आराधना की। तब भगवान शिव ने सभी देवताओं को कहा कि आप सभी पशु बनकर तीनों को एक जगह इकट्ठा कीजिए , मैं पशुपति बनकर उन तीनों का वध करूंगा। दुदंबर माली ने तलवार से भगवान शिव के गर्दन काटी, जो कि नेपाल में जाकर गिरी जिसे आज हम पशुपतिनाथ के रूप में जानते हैं। पीछे का जो हिस्सा बचा था , उसे केदारनाथ में स्थापित किया गया। उसके पश्चात भगवान शिव ने क्रोध में आकर तीनों का संहार किया और देवताओं को उनके अत्याचारों से मुक्त किया।
नंदनवन में भगवान शंकर एक बार पार्वती जी को लेकर गए और सरोवर किनारे बैठा दिए, वही अशोक के वृक्ष के नीचे कन्या का जन्म हुआ और जब शिव और पार्वती ने देखा और उसके सुंदर रूप को देखकर उसका नाम अशोक सुंदरी रखा , जब भगवान शंकर अर्थात महेश और माता पार्वती अर्थात उमा ने एक दूसरे को एकटक देखने लगे, तब शमी नाम पौधे का जन्म हुआ, यही से माहेश्वरी समाज का जन्म हुआ। 12 ज्योतिर्लिंग सोमनाथ, काशी विश्वनाथ, केदारनाथ, रामेश्वरम, त्रंबकेश्वर, भीमाशंकर, मल्लिकार्जुन, ओंकारेश्वर बैजनाथ , कृष्णेश्वर , नागेश्वर, उज्जैन के महाकाल, जनमानस के भलाई के लिए प्रकट हुए।
कथा समाप्ति के पश्चात विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। सिद्धेश्वर महापुराण कथा आयोजक राजेश साहू किरण साहू , जलेश्वर साहू गोदावरी साहू ,योगेश साहू आराधना साहू , सहित पूरे साहू परिवार की तरफ से सभी को धन्यवाद दिया गया।
Author: Deepak Mittal










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