नई दिल्ली/गुवाहाटी: 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने सबसे बड़ा और सधा हुआ राजनीतिक दांव चल दिया है। पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को असम विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार चयन समिति (स्क्रीनिंग कमेटी) का चेयरपर्सन बनाया गया है। यह फैसला ऐसे समय पर आया है, जब असम समेत पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु के चुनाव कांग्रेस के लिए ‘करो या मरो’ की तरह देखे जा रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या प्रियंका गांधी असम में कांग्रेस के 10 साल पुराने सत्ता के सूखे को खत्म कर पाएंगी?
क्यों खास है असम की जिम्मेदारी?
असम में प्रियंका गांधी की भूमिका इसलिए भी ऐतिहासिक मानी जा रही है, क्योंकि गांधी परिवार का कोई सदस्य पहली बार किसी राज्य के चुनाव में स्क्रीनिंग कमेटी की कमान संभाल रहा है। इससे साफ संकेत मिलता है कि कांग्रेस अब उम्मीदवार चयन, गठबंधन और रणनीति में कोई ढील नहीं देना चाहती।
प्रियंका के सामने चुनौती है ऐसे उम्मीदवार सामने लाने की, जो बीजेपी के मजबूत संगठन और सत्ता विरोधी माहौल—दोनों से एक साथ मुकाबला कर सकें।
चार राज्यों में चार रणनीतिक चेहरे
कांग्रेस ने 2026 के बड़े चुनावी रण के लिए अलग-अलग राज्यों में अनुभवी नेताओं को जिम्मेदारी दी है।
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केरल: मधुसूदन मिस्त्री
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तमिलनाडु-पुडुचेरी: टीएस सिंहदेव
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पश्चिम बंगाल: बीके हरिप्रसाद
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असम: प्रियंका गांधी
इन सबके बीच सबसे ज्यादा निगाहें असम पर टिकी हैं, जहां बीजेपी 2016 से सत्ता में है और कांग्रेस वापसी के लिए बेचैन है।
असम कांग्रेस के लिए क्यों अहम?
असम सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर की राजनीति का प्रवेश द्वार है। 2021 के विधानसभा चुनाव में 126 सदस्यीय सदन में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को 75 सीटें, जबकि कांग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थीं। दिलचस्प बात यह है कि दोनों गठबंधनों के वोट शेयर में अंतर सिर्फ 1.6 फीसदी का था। यानी मुकाबला बेहद करीबी रहा था।
गौरव गोगोई पर बड़ा दांव
असम में कांग्रेस का सबसे मजबूत चेहरा माने जा रहे हैं गौरव गोगोई—पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बेटे और 2024 से लोकसभा में डिप्टी लीडर ऑफ विपक्ष। राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि प्रियंका गांधी की नियुक्ति, गौरव गोगोई को और मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है, ताकि संगठन में एकजुटता आए और अंदरूनी खींचतान कम हो।
लेकिन राह आसान नहीं
प्रियंका गांधी के लिए यह जिम्मेदारी आसान नहीं मानी जा रही। 2019 में सक्रिय राजनीति में आने के बाद उन्हें 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बड़ा झटका लगा था, जब कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई थी। यह अनुभव बताता है कि सिर्फ चेहरा नहीं, बल्कि जमीनी रणनीति और मजबूत गठबंधन जीत की कुंजी होते हैं।
बदला हुआ अंदाज, बदला हुआ संदेश
हाल के महीनों में प्रियंका गांधी का अंदाज बदला-बदला नजर आया है। संसद के भीतर और बाहर बीजेपी पर उनके तीखे हमले, मनरेगा से लेकर वोटर लिस्ट संशोधन जैसे मुद्दों पर आक्रामक रुख और आत्मविश्वास भरी मौजूदगी ने उन्हें फिर से चर्चा में ला दिया है।
बीजेपी भी तैयार, हमले तेज
उधर, असम में बीजेपी ने भी मोर्चा खोल दिया है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा लगातार गौरव गोगोई पर हमलावर हैं और उनकी पत्नी को लेकर आरोप लगा चुके हैं। कांग्रेस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे चुनावी बयानबाजी बताया है। साफ है कि आने वाले महीनों में राजनीतिक पारा और चढ़ेगा।
क्या बदल पाएगा खेल?
प्रियंका गांधी के सामने सिर्फ उम्मीदवार चुनने की नहीं, बल्कि विश्वास बहाल करने की सबसे बड़ी चुनौती है। अगर वह सामाजिक समीकरण साध पाईं, गठबंधन को मजबूती दे पाईं और संगठन को एकजुट कर पाईं, तो 2026 का असम चुनाव कांग्रेस के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है।
अब सबकी निगाहें प्रियंका गांधी पर हैं—
क्या असम से कांग्रेस की सत्ता वापसी की कहानी लिखी जाएगी, या 10 साल का सूखा और लंबा खिंचेगा?
Author: Deepak Mittal










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