नई दिल्ली: दिल्ली की साकेत कोर्ट ने अवैध बांग्लादेशी अप्रवासी बिलाल हुसैन को दी गई जमानत रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि केवल किसी आरोपी के अवैध अप्रवासी होने के आधार पर उसे अनिश्चितकाल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब उसने जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया हो।
एडिशनल सेशंस जज गौरव गुप्ता ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए दिल्ली पुलिस की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस तथ्य या सामग्री नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने जमानत पर रहते हुए अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया है या जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी का भारत में अवैध रूप से रहना एक अलग कानूनी पहलू है, लेकिन जब तक जमानत की शर्तों का पालन किया जा रहा है, तब तक केवल इसी आधार पर उसे जेल में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि भविष्य में कोई नया तथ्य या ठोस सबूत सामने आता है, जिससे आरोपी को हिरासत में लेना आवश्यक हो, तो जांच एजेंसी या अभियोजन पक्ष नई अर्जी दायर कर सकता है।
गौरतलब है कि बिलाल हुसैन 2024 में फतेहपुर बेरी थाने में दर्ज एक एफआईआर के मामले में आरोपी है। दिल्ली पुलिस ने उसे 28 दिसंबर 2024 को गिरफ्तार किया था। इसके बाद चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने 24 नवंबर 2025 को उसे जमानत दे दी थी, जिसे रद्द कराने के लिए राज्य सरकार ने याचिका दायर की थी।
अभियोजन के आरोप
अभियोजन पक्ष का दावा है कि बिलाल हुसैन बांग्लादेशी नागरिक है, जिसने अवैध रूप से भारत में प्रवेश किया और आधार कार्ड सहित भारतीय पहचान दस्तावेज हासिल किए। पुलिस के अनुसार, आरोपी की निशानदेही पर अलग-अलग नामों से कई आधार कार्ड, पांच पैन कार्ड और बांग्लादेशी पहचान पत्र बरामद किए गए हैं। यह भी आरोप है कि वह बांग्लादेशी नागरिकों को अवैध रूप से भारत लाने और उनके लिए भारतीय पहचान दस्तावेज बनवाने के नेटवर्क में शामिल था।
जांच एजेंसियों ने अदालत को बताया कि आरोपी के पास से बरामद आधार कार्ड का वेरिफिकेशन अभी लंबित है, क्योंकि इस संबंध में UIDAI से कोई आधिकारिक जवाब नहीं मिला है। अभियोजन पक्ष ने यह भी दलील दी थी कि आरोपी का भाई अनीश शेख फरार है और अगर बिलाल हुसैन को जमानत पर रहने दिया गया, तो उसके फरार होने या अन्य वांछित आरोपियों को सतर्क करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को फिलहाल जमानत रद्द करने के लिए पर्याप्त नहीं माना और कहा कि जब तक आरोपी द्वारा शर्तों के उल्लंघन या आज़ादी के दुरुपयोग का ठोस सबूत सामने नहीं आता, तब तक जमानत रद्द नहीं की जा सकती।
Author: Deepak Mittal










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