मोबाइल, पढ़ाई का दबाव और घर का तनाव—चुपचाप बच्चों के दिमाग पर पड़ रहा गहरा असर

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नई दिल्ली: आज का दौर बच्चों के लिए जितना आधुनिक और सुविधाजनक है, उतना ही मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण भी बनता जा रहा है। पढ़ाई का बढ़ता दबाव, मोबाइल और इंटरनेट की लत, बदलता पारिवारिक माहौल—ये सभी कारक बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर चुपचाप लेकिन गहरा असर डाल रहे हैं।

जहां पहले बच्चे मैदानों में खेलते, दोस्तों के साथ समय बिताते और परिवार के साथ खुलकर बातें करते थे, वहीं अब उनका अधिकांश समय स्क्रीन, ऑनलाइन कंटेंट और प्रतिस्पर्धा के बीच गुजर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में बच्चों में चिंता, अवसाद और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ सकती हैं।

 माता-पिता का बर्ताव बना रहा मानसिक नींव

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की शुरुआत घर से होती है। बच्चा सबसे पहले माता-पिता के व्यवहार से ही दुनिया को समझता है।
अगर घर में तनाव का माहौल हो, माता-पिता अक्सर गुस्से में बात करें या बच्चों की बात सुने बिना उन्हें डांट दें, तो बच्चे के मन में डर और असुरक्षा घर कर जाती है।

ऐसे बच्चे अपनी भावनाओं को दबाने लगते हैं, खुद को अकेला महसूस करते हैं और धीरे-धीरे यह स्थिति चिंता और आत्मविश्वास की कमी में बदल जाती है।
वहीं, जब माता-पिता प्यार से बात करते हैं, गलतियों पर समझाते हैं और बच्चे की भावनाओं को महत्व देते हैं, तो बच्चा खुद को सुरक्षित और समझा हुआ महसूस करता है, जो उसके मानसिक विकास के लिए बेहद जरूरी है।

 स्कूल का माहौल भी जिम्मेदार

बच्चों की जिंदगी में स्कूल दूसरी सबसे बड़ी दुनिया होता है। अगर स्कूल में हर वक्त नंबरों की होड़, बच्चों की आपसी तुलना और सख्त अनुशासन का दबाव बना रहे, तो बच्चे के मन में असफल होने का डर बैठ जाता है।

मनोविज्ञान बताता है कि डर के माहौल में बच्चे का दिमाग ठीक से काम नहीं कर पाता। इसके उलट, अगर स्कूल का वातावरण सहयोगी हो, जहां गलतियों से सीखने का मौका मिले, तो बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता है और मानसिक संतुलन बना रहता है।

 स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया का असर

आज के समय में मोबाइल और सोशल मीडिया बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के सबसे बड़े दुश्मन बनते जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर दिखने वाली परफेक्ट जिंदगी और चमक-दमक बच्चों को खुद से तुलना करने पर मजबूर कर देती है।

दूसरों को ज्यादा सुंदर, ज्यादा सफल देखकर बच्चों में हीन भावना जन्म लेने लगती है। साथ ही, नकारात्मक टिप्पणियां और गलत जानकारी उनके सोचने के तरीके को प्रभावित करती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों का दिमाग अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता, इसलिए वे ऑनलाइन कंटेंट को आसानी से सच मान लेते हैं, जिससे भ्रम, डर और उदासी जैसी भावनाएं पैदा हो सकती हैं।

 समय रहते जागरूकता जरूरी

विशेषज्ञों की मानें तो बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर परिणाम ला सकता है। माता-पिता, स्कूल और समाज—तीनों को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां बच्चे खुलकर अपनी बात कह सकें, खुद को सुरक्षित महसूस करें और मानसिक रूप से मजबूत बन सकें।

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Author: Deepak Mittal

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