दिल्ली: हर साल 30 जनवरी को ‘विश्व कुष्ठ रोग दिवस’ मनाया जाता है। भारत में यह दिन महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के रूप में भी विशेष महत्व रखता है। गांधीजी ने कुष्ठ रोगियों के साथ रहकर न सिर्फ उनका दर्द समझा, बल्कि समाज को उनके प्रति सम्मान और संवेदनशीलता का संदेश भी दिया। इस दिवस का उद्देश्य कुष्ठ रोग से जुड़े कलंक और भेदभाव को खत्म करना, जागरूकता बढ़ाना और प्रभावित लोगों को सम्मानजनक जीवन देने की अपील करना है।
कुष्ठ रोग एक संक्रामक बीमारी है, जो माइकोबैक्टीरियम लेप्री नामक बैक्टीरिया से होती है। राहत की बात यह है कि इसका इलाज पूरी तरह संभव है। मल्टी ड्रग थेरेपी (एमडीटी) के जरिए कुछ ही महीनों में मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है। समय पर पहचान होने पर हाथ-पैर में स्थायी विकृति से भी बचाव संभव है और मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।
हालांकि, आज भी इस बीमारी से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या इलाज नहीं, बल्कि समाज में फैली गलत धारणाएं और कलंक हैं। लोग इसे तेजी से फैलने वाली, लाइलाज या पाप-श्राप से जुड़ी बीमारी मान लेते हैं। इन मिथकों के चलते कुष्ठ रोगियों के साथ भेदभाव होता है—कई बार उन्हें घर से निकाल दिया जाता है, नौकरी छिन जाती है, बच्चे स्कूल नहीं जा पाते और सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, कलंक इतना गहरा है कि कई लोग लक्षण दिखने के बावजूद डॉक्टर के पास जाने से डरते हैं। उन्हें आशंका रहती है कि बीमारी उजागर होने पर उनका सामाजिक जीवन खत्म हो जाएगा। इसी डर के कारण बीमारी बढ़ती है, जटिलताएं आती हैं और संक्रमण फैलने का खतरा भी बना रहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि “कुष्ठ रोग का इलाज आसान है, असली चुनौती समाज से कलंक को मिटाना है।”
कुष्ठ रोग दिवस के अवसर पर देशभर में जागरूकता रैलियां, स्कूलों में सेमिनार, स्वास्थ्य शिविर और रोगियों के साथ संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य मिथकों को तोड़ना और समय पर जांच व उपचार के महत्व को समझाना है। डब्ल्यूएचओ और भारत सरकार के संयुक्त प्रयासों से नए मामलों में कमी आई है, लेकिन पूर्ण उन्मूलन के लिए समाज की भागीदारी बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, दुनियाभर के करीब 53 प्रतिशत कुष्ठ रोग के मामले भारत में पाए जाते हैं। डब्ल्यूएचओ का लक्ष्य वर्ष 2030 तक स्थानीय स्तर पर कुष्ठ रोग के मामलों को खत्म करना है, जबकि भारत सरकार ने 2027 तक कुष्ठ-मुक्त भारत का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए जरूरी है कि इलाज के साथ-साथ कलंक और भेदभाव के खिलाफ भी सामूहिक लड़ाई लड़ी जाए।
Author: Deepak Mittal









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