सदनों की समय-सीमा तय हो, तभी विधायी कार्य प्रभावी होगा: राज्यपाल आनंदीबेन पटेल

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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने विधानसभा के संचालन के लिए स्पष्ट और सुनिश्चित समय-सीमा तय किए जाने पर जोर देते हुए कहा है कि तभी विधायी कार्य प्रभावी हो सकेगा। उन्होंने कहा कि अल्प अवधि के सत्रों में कई बार विधायकों को अपनी बात पूरी तरह रखने का अवसर नहीं मिल पाता, जिससे जनहित से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक चर्चा बाधित होती है। राज्यपाल ने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा इस दिशा में दिए गए सुझाव को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए आशा जताई कि इस पर गंभीरता से अमल किया जाएगा।

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने सोमवार को विधानसभा, लखनऊ में 19 से 21 जनवरी तक आयोजित अखिल भारतीय 86वें पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने देशभर से आए विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और गणमान्य अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यदि विधानसभाएं केवल चार, पांच या दस दिनों के लिए संचालित होती हैं, तो समय के अभाव में जनप्रतिनिधियों की आवाज सदन तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाती। ऐसे में सदनों की कार्यवाही को अधिक व्यवस्थित, प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने के लिए उनकी अवधि का स्पष्ट निर्धारण आवश्यक है।

राज्यपाल ने उम्मीद जताई कि सम्मेलन के दो-तीन दिनों के भीतर इस विषय पर व्यावहारिक और ठोस निर्णय सामने आएंगे। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इस प्रतिष्ठित सम्मेलन का आयोजन होना प्रदेश के लिए गौरव की बात है। यह सम्मेलन भारतीय संसदीय परंपराओं की सुदृढ़ता, मर्यादा और निरंतरता का प्रतीक है। लखनऊ की तहजीब, संवाद और समन्वय की परंपरा इस आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान करती है।

राज्यपाल ने पीठासीन अधिकारियों को लोकतंत्र की आत्मा का संरक्षक बताते हुए कहा कि उनकी निष्पक्षता, विवेक और मर्यादित आचरण ही सदनों को जनआकांक्षाओं की प्रभावी अभिव्यक्ति का मंच बनाते हैं। उन्होंने कहा कि विधानमंडल जनआकांक्षाओं को स्वर देने का पवित्र मंच है और सदन की सार्थकता केवल बहसों की संख्या से नहीं, बल्कि लोककल्याण की भावना, तथ्यपरक और समाधानोन्मुख चर्चाओं से तय होती है।

उन्होंने सदन की कार्यवाही में बार-बार होने वाले व्यवधान को गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि इससे जनहित के मुद्दों पर चर्चा प्रभावित होती है और लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास भी कमजोर पड़ता है। विचारों की भिन्नता को लोकतंत्र की शक्ति बताते हुए राज्यपाल ने असहमति को लोकतांत्रिक सौंदर्य के रूप में स्वीकार करने का आह्वान किया।

इस अवसर पर राज्यपाल ने उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के मार्गदर्शन में प्रकाशित पुस्तक ‘उत्तर प्रदेश विधानसभा की संसदीय पद्धति और प्रक्रिया’ की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रकाशन लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संसदीय अनुशासन के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह सम्मेलन गहन, संतुलित और सार्थक विचार-विमर्श का मंच बनेगा और संसदीय प्रणाली को और अधिक सशक्त, संवेदनशील और प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।

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Author: Deepak Mittal

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