कैलाश खेर ने ‘वंदे मातरम’ को बताया पवित्र भावना, कहा- यह एकता और समर्पण का प्रतीक

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कैलाश खेर ने ‘वंदे मातरम’ को बताया पवित्र भावना, कहा- यह एकता और समर्पण का प्रतीक
गायक ने रायपुर राज्योत्सव में 70 हजार लोगों के साथ गाए वंदे मातरम की याद साझा की

मुंबई। राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रसिद्ध गायक कैलाश खेर ने इसे देशभक्ति और एकता की पवित्र भावना बताया है। उन्होंने इस खास मौके पर अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर रायपुर में आयोजित छत्तीसगढ़ राज्योत्सव की एक झलक साझा की, जहां उन्होंने 70 हजार से अधिक लोगों के साथ वंदे मातरम गाया था।

कैलाश खेर ने वीडियो के साथ लिखा, “‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे हुए, तो मैं रायपुर में हुए छत्तीसगढ़ राज्योत्सव (5 नवंबर) की यह यादगार घड़ी साझा कर रहा हूं, जब 70,000 से अधिक लोगों ने एक साथ मिलकर वंदे मातरम गाया।” उन्होंने आगे लिखा, “यह हमारे देशभक्ति की पवित्र भावना, एकता और मां भारती के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यह गर्व, भावना और समर्पण का पल है — वंदे भारत।”

‘वंदे मातरम’ का गौरवशाली इतिहास
1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत मातृभूमि के प्रति समर्पण, एकता और स्वाभिमान का प्रतीक है। इसे पहली बार बंगदर्शन पत्रिका में प्रकाशित किया गया था और बाद में 1882 में बंकिम चंद्र की प्रसिद्ध कृति ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे संगीतबद्ध कर पहली बार गाया था।

14 अगस्त 1947 की रात संविधान सभा की पहली बैठक की शुरुआत ‘वंदे मातरम’ से हुई थी, जबकि 7 अगस्त 1905 को बंगाल विभाजन के विरोध में इसे पहली बार राजनीतिक नारे के रूप में प्रयोग किया गया।

कैलाश खेर का संगीत सफर
कैलाश खेर ने अपने करियर में अनेक सुपरहिट गीत दिए हैं। उन्हें पहला मौका एक विज्ञापन जिंगल के लिए मिला था — नक्षत्र डायमंड्स के विज्ञापन गीत के लिए उन्हें 5000 रुपये का पारिश्रमिक मिला था। इसके बाद 2003 में संगीतकार विशाल-शेखर ने उन्हें फिल्म ‘वैसा भी होता है’ के मशहूर गीत ‘अल्लाह के बंदे’ गाने का अवसर दिया, जिसने उन्हें रातोंरात प्रसिद्ध कर दिया।

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Author: Deepak Mittal

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