नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया को लेकर हमेशा एक सवाल चर्चा में रहा—क्या वह भारत के क़रीब थीं या पाकिस्तान के? उनकी राजनीतिक यात्रा और विदेश नीति से जुड़े फैसले इस सवाल को और पेचीदा बना देते हैं।
ख़ालिदा ज़िया आख़िरी बार 2012 में भारत आई थीं, तब वह बांग्लादेश में विपक्ष की नेता थीं। भारत सरकार के निमंत्रण पर आए इस दौरे में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, विदेश मंत्री सलमान ख़ुर्शीद और विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज समेत कई बड़े नेताओं से मुलाक़ात की थी। यह दौरा रिश्तों में नई शुरुआत के संकेत के तौर पर देखा गया।
प्रधानमंत्री रहते भारत से दूरी
हालांकि, जब ख़ालिदा ज़िया 2006 में प्रधानमंत्री के रूप में भारत आई थीं, तब यह यात्रा किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच पाई।
उस वक्त व्यापार असंतुलन, ऊंची टैरिफ दरें, नदियों के पानी के बंटवारे और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़े सुरक्षा मुद्दों पर बातचीत में गतिरोध पैदा हो गया था।
भारत को इस बात की भी चिंता थी कि बांग्लादेश की ज़मीन का इस्तेमाल पूर्वोत्तर के अलगाववादी तत्व कर रहे हैं। इन मुद्दों के कारण रिश्तों में तल्ख़ी बनी रही।
भारत के बाद पाकिस्तान का रुख
दिल्ली यात्रा के बाद ख़ालिदा ज़िया का पाकिस्तान दौरा सुर्खियों में आया।
भारत में यह धारणा मज़बूत हुई कि बीएनपी नेतृत्व का झुकाव पाकिस्तान की ओर ज़्यादा सहानुभूतिपूर्ण है। पाकिस्तान के प्रति उनके नरम रवैये को नई दिल्ली ने कभी सहज रूप से स्वीकार नहीं किया।
बेगमों की लड़ाई’ और विदेश नीति
ख़ालिदा ज़िया और शेख़ हसीना के बीच दशकों चली राजनीतिक टकराव को ‘बेगमों की लड़ाई’ कहा जाता है।
जहां शेख़ हसीना का झुकाव भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी की ओर रहा, वहीं ख़ालिदा ज़िया ने अक्सर भारत की नीतियों पर सवाल उठाए।
यहां तक कि भारत दौरे के बाद उन्होंने शेख़ हसीना को “भारत की कठपुतली” तक कह दिया, जिससे रिश्तों में फिर खटास आ गई।
भारत की साधने की कोशिश, लेकिन भरोसा नहीं बन पाया
भारत ने 2012 में ख़ालिदा ज़िया को आमंत्रित कर यह संदेश देने की कोशिश की कि वह केवल अवामी लीग तक सीमित नहीं है।
ख़ालिदा ज़िया ने भी कहा था कि वह “खुले दिमाग़ से भारत आई हैं और पुरानी कड़वाहट मिटाना चाहती हैं।”
लेकिन बाद के बयानों, जमात-ए-इस्लामी से नज़दीकियों और पाकिस्तान के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रुख ने भारत का भरोसा डगमगा दिया।
तो जवाब क्या है?
विशेषज्ञों की मानें तो ख़ालिदा ज़िया पूरी तरह भारत-विरोधी नहीं थीं, लेकिन
✔️ भारत को लेकर उनका रवैया हमेशा सशंकित और संतुलित दूरी वाला रहा
✔️ पाकिस्तान के प्रति उन्होंने अपेक्षाकृत नरम और सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाया
✔️ भारत के मुक़ाबले उन्होंने रणनीतिक विकल्प खुले रखने की नीति अपनाई
यही वजह है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन साधने की कोशिश में, ख़ालिदा ज़िया कभी भी भारत की “स्वाभाविक साझेदार” नहीं बन सकीं।
उनकी राजनीति और विदेश नीति ने दक्षिण एशिया में आज भी बहस को ज़िंदा रखा है।
Author: Deepak Mittal










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