Govardhan Puja 2024: जब भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र का अभिमान किया चूर, पढ़ें इससे जुड़ी रोचक कथा

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Govardhan Puja 2024: गोवर्धन पूजा सनातन धर्म में विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है और दिवाली के अगले दिन मनाई जाती है. इस वर्ष, गोवर्धन पूजा 2 नवंबर को मनाई जा रही है, जिसमें प्रातःकालीन पूजन का शुभ मुहूर्त सुबह 06:34 से 08:46 तक और सायंकालीन पूजन मुहूर्त 03:23 से 05:35 बजे तक रहेगा. इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा करने और उसकी कथा सुनने का विशेष महत्व है, जो हर श्रद्धालु के लिए अत्यंत फलदायक मानी जाती है

गोवर्धन पूजा की कथा के अनुसार, एक बार देवताओं के राजा इंद्र को अपनी शक्ति पर अत्यधिक घमंड हो गया था. भगवान श्रीकृष्ण ने उनके इस अभिमान को समाप्त करने की योजना बनाई. गोकुल में एक बार सभी ग्रामीण विभिन्न पकवान बना रहे थे और देवता इंद्र की पूजा की तैयारी में व्यस्त थे. तब बालकृष्ण ने अपनी माता यशोदा से पूछा कि यह पूजा किस लिए हो रही है. यशोदा मैया ने बताया कि यह पूजा इंद्र देव के लिए है, जो वर्षा प्रदान कर फसल को पनपने में सहायता करते हैं.

गोवर्धन पर्वत की पूजा

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि हमें इंद्र देव की बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि इसी पर्वत की छत्रछाया में गायें चारा पाती हैं और वहां की वनस्पतियों के कारण ही हमारे गांव में वर्षा होती है. गोकुलवासी श्रीकृष्ण की बातों से सहमत हो गए और इंद्र देव की बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे.

श्रीकृष्ण ने इंद्र के क्रोध से गोकुलवासियों को बचाया

जब इंद्र देव को यह पता चला कि उनकी जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा हो रही है, तो वे क्रोधित हो गए और गोकुल पर मूसलधार बारिश बरसाने लगे. यह विनाशकारी बारिश कई दिनों तक चली, जिससे गोकुलवासियों का जीवन संकट में पड़ गया. ऐसे समय में भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया, जिसके नीचे गोकुल के लोग और पशु-पक्षी सुरक्षित आश्रय पा सके. इंद्र देव ने सात दिनों तक लगातार बारिश की, लेकिन श्रीकृष्ण के उठाए पर्वत के नीचे गोकुलवासियों को कोई हानि नहीं हुई.

इस घटना के बाद इंद्र देव को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी. उन्होंने श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार मानकर उनकी पूजा की और उनका अभिमान चूर हो गया. इस प्रकार, गोवर्धन पूजा की परंपरा आरंभ हुई, जो आज भी पूरे श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है.

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Author: Deepak Mittal

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