भारत की आत्मा से विश्व मंच तक: हिंदी बनी पहचान, संस्कृति और वैचारिक स्वतंत्रता की वैश्विक आवाज

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Deepak Mittal

महाराष्ट्र: वैश्विक मंच पर भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी भाषाई, सांस्कृतिक और वैचारिक विविधता है। इसी विविधता को जोड़ने वाला सबसे सशक्त सूत्र हिंदी भाषा है, जो केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक चेतना, संस्कृति और पहचान की संवाहक है। यह विचार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हिंदी भावनाओं की भाषा है—जिसमें प्रेम, पीड़ा और प्रतिरोध समान रूप से सहज हैं।

भावनानी ने कहा कि आज भी समाज में अंग्रेजी को आधुनिकता और प्रतिष्ठा का प्रतीक मानने की मानसिकता बनी हुई है। कई माता-पिता गर्व से यह जताते हैं कि उनका बच्चा कितनी धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलता है, जबकि हिंदी से दूरी बनाना कहीं न कहीं मानसिक उपनिवेशवाद का संकेत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह विमर्श अंग्रेजी के विरोध का नहीं, बल्कि हिंदी के आत्मसम्मान का है। अंग्रेजी वैश्विक संपर्क की भाषा हो सकती है, लेकिन हिंदी हमारी पहचान की भाषा है।

डिजिटल युग में हिंदी की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन लर्निंग, वॉइस असिस्टेंट, चैटबॉट, सोशल मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता में हिंदी की मौजूदगी लगातार बढ़ रही है। लंबे समय तक यह माना जाता था कि तकनीक केवल अंग्रेजी तक सीमित रहेगी, लेकिन हिंदी ने इस धारणा को तोड़ दिया है। आज करोड़ों लोग इंटरनेट पर हिंदी में खोज करते हैं, कंटेंट बनाते हैं और संवाद स्थापित कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि हिंदी के सम्मान और प्रचार-प्रसार के लिए 14 सितंबर (राष्ट्रीय हिंदी दिवस) और 10 जनवरी (विश्व हिंदी दिवस) मनाए जाते हैं। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया था, जबकि 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस का उद्देश्य हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठा दिलाना है। वर्ष 1975 में नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन और 2006 में 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस की औपचारिक घोषणा ने हिंदी के वैश्विक आंदोलन को नई दिशा दी।

संविधान के अनुच्छेद 343 से 351 तक हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन का प्रावधान करते हैं। इसके बावजूद यदि स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी हिंदी को हीनता से जोड़ा जाता है, तो यह वैचारिक गुलामी का संकेत है। भावनानी ने जोर देकर कहा कि हिंदी का सशक्तिकरण अन्य भारतीय भाषाओं के सम्मान और सह-अस्तित्व के साथ ही संभव है।

संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को सातवीं आधिकारिक भाषा बनाए जाने की मांग पर उन्होंने कहा कि हिंदी विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शामिल है और भारत वैश्विक राजनीति व अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। यदि हिंदी को यह दर्जा मिलता है, तो यह केवल भाषा की नहीं, बल्कि वैश्विक बहुभाषिक लोकतंत्र की जीत होगी।

अंत में उन्होंने कहा कि हिंदी का भविष्य किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना और व्यवहार से तय होगा। यदि समाज हिंदी में सोचने, गर्व करने और उसे तकनीकी व वैश्विक बनाने का संकल्प ले, तो हिंदी न केवल भारत की आत्मा बनी रहेगी, बल्कि विश्व संवाद की सशक्त भाषा के रूप में भी स्थापित होगी।
हिंदी केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना है।

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Author: Deepak Mittal

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