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देवाधिदेव महादेव – जब भक्ति में लय हो गया कविता का सौंदर्य, पढ़िए डॉ. सरिता चौहान की आत्मिक रचना

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Deepak Mittal

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश। भक्ति और साहित्य का जब समन्वय होता है, तो वह रचना सिर्फ शब्द नहीं रहती — वह पूजा बन जाती है। ऐसा ही एक अनुपम उदाहरण सामने आया है पीएम श्री एडी राजकीय कन्या इंटर कॉलेज, गोरखपुर की शिक्षिका डॉ. सरिता चौहान की कलम से निकली रचना “देवाधिदेव महादेव” में।

यह काव्य न केवल शिव की महिमा का स्तुति-गान है, बल्कि इसमें भारतीय भक्ति परंपराकाव्य सौंदर्य, और शिवत्व के गूढ़ रहस्य का अद्भुत समावेश भी दिखाई देता है।

भावपूर्ण पंक्तियाँ जो आत्मा को झंकृत करती हैं:

आशुतोष हो, कृपालु हो,
तुम दयालु हो, कृपालु हो।
मृत्युंजय हो, त्र्यंबक हो,
महेश हो, विश्वेश हो,
देवाधिदेव महादेव हो।

गले सांपों की माला है,
कंबल में मृगछाल है।
बाघाम्बर धारी हो,
त्रिशूल धारी हो,
देवाधिदेव महादेव हो

बसहा बैल की करते सवारी हो,
डमरू वाले हो।
कैलाशी हो, अविनाशी हो,
शशांक हो, शेखर हो,
देवाधिदेव महादेव हो।

विश्वनाथ हो, भोलेनाथ हो,
नागेश्वर हो, शिवशंकर हो।
महेश हो, गिरीश हो,
ईश्वर हो, जगदीश्वर हो,
देवाधिदेव महादेव हो।

शूलपाणि हो, माहेश्वर हो,
विश्वंभर हो, योगेश्वर हो।
त्रिलोकीनाथ हो, त्रिलोचनाय हो,
सर्वेश्वर हो, दानेश्वर हो,
देवाधिदेव महादेव हो।

शीश पर गंगा हैं, गले भुजंग है,
सुर-नर मुनिजन उच्चारते हैं।
संचालक हो, पालक हो,
सत्य हो, शिव हो और सुंदर हो,
देवाधिदेव महादेव हो।।

इन पंक्तियों में महादेव के रूपस्वभाव, और संपूर्ण सृष्टि पर नियंत्रण को भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है।

लेखिका का परिचय:

डॉ. सरिता चौहान एक समर्पित शिक्षिका हैं, जो गोरखपुर के पीएम श्री एडी राजकीय कन्या इंटर कॉलेज में कार्यरत हैं। उनकी यह रचना बताती है कि एक शिक्षक सिर्फ ज्ञान नहीं, बल्कि संस्कृति और संस्कार भी बच्चों में रोप सकता है।

यह काव्य क्यों है विशेष?

  • शिव के अष्टोत्तर नामों और तांडव भाव का समावेश

  • शुद्ध हिंदी छंद और अनुप्रास अलंकार से भरपूर

  • भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा को समर्पित

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