प्रदीप चोपड़ा बालोद की रिपोर्टिंग..

बालोद : गुरु पूर्णिमा पर विशेष प्रवचन –गुरु दक्षिणा देने का पर्व है ऋण चुकाने का पर्व है- गुरु के बिना जीवन की शुरुआत नहीं होती है– साध्वी श्री प्रमिला श्री जी
आज गुरु पूर्णिमा का विशेष प्रसंग उपस्थित हुआ है आज का महत्वपूर्ण दिन गुरु को प्रसन्न करने का मौका हमारे हाथों पर है ,गुरु दक्षिणा देने का पर्व है ऋण चुकाने का पर्व है ,गुरु को उच्च स्थान दिया गया है गुरु याने कि जिनके भार कोई उठा नहीं सकता, फिर भी सारी दुनिया गुरु की आभारी है। गुरु के बिना जीवन की शुरुआत नहीं होती गुरु जिंदगी की उपलब्धि है। जिंदगी बनाने का अनमोल मौका है आज हमें सब कुछ गुरु कृपा से प्राप्त हुआ है.

उक्त उद्गार समता भवन में चातुर्मास प्रारंभ की बेला में आचार्य श्री रामलालजी मसा की सुशिष्या शासन दीपिका श्रीप्रमिला श्रीजी मसा ने कहीं। महासती ने आगे कहा कि जिंदगी का सारा श्रेय गुरु को ही जाता है आज जो कुछ मिला है वह गुरु कृपा से मिला है गुरु को गोविंद से भी श्रेष्ठतम बताया गया है। भले ही आज पारिवारिक जन, सामाजिक जन रूठ जाए लेकिन गुरु कभी रूठना नहीं चाहिए। इसका हम ध्यान रखें ।
गुरु रूठ गए मतलब हमारा सौभाग्य भविष्य भी रूठ गया । जिंदगी की उपलब्धि गुरु कृपा से प्राप्त हुई है हमारी कोई भी उपलब्धि के पीछे गुरु का हाथ है। प्राचीन काल में द्रोणाचार्य ने एकलव्य से अंगूठा मांगा उन्होंने तत्पर समर्पित कर दिया यह गुरु भक्ति ही है । भगवान राम पर भी गुरु वशिष्ठ का ही हाथ था। गुरु है तो सब कुछ है हम अपने जीवन में देखे की हम गुरु की कितनी मानते हैं यदि गुरु की मानेंगे तो बहुत कुछ मिलेगा। आज राम जैसे गुरुवर को पाकर हर व्यक्ति अपने आप को धन्य मान रहा है।
व्यक्ति के भीतर गुरु के प्रति समर्पणा भाव व दक्षिणा देने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। गुरु के बताएं गए आयाम पर हमें निरंतर चलना होगा। इसके पहले साध्वी श्रीअनुजाश्रीजी मसा ने कहा कि गुरु अंधकार मार्ग से सन्मार्ग की ओर ले जाने का कार्य व भटकते को रास्ता दिखाने का कार्य करते है। हमारे जीवन में सर्वप्रथम माता-पिता के बाद गुरु का ही स्थान है ,गुरु हमारे भीतर उर्जा प्रदान करते हैं ।साध्वी श्री दीक्षिताश्रीजी मसा ने जन समुदाय से सफलता व मूल्यवान बनने पर जोर दिया।
गुरु कृपा भक्ति में जुट जाएं —-जैन धर्म का प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी चार माह का चातुर्मास 20 जुलाई से प्रारंभ हुआ। इन दिनों में साधु साध्वी चार महीने एक जगह रहकर अहिंसा धर्म का पालन करते हुए जैन धर्म के बताएं सिद्धांतों को अपनाते हुए धर्म-कर्म ,ज्ञान की खूब आराधना होती है इसके साथ ही श्रावक श्राविकाओं ने त्याग तपस्या व धर्म आराधना की सभा का संचालन देवेन्द्र नाहटा ने किया
तीन उपवास करने वालों में,,,
हमीरमल नाहटा ,देवीचंद चोपड़ा, महेंद्र नाहर ,निर्मल नाहटा ,गौरव चौरडिया,श्रेयांश श्रीश्रीमाल, हरीश सांखला ,नीलम ललवानी, वर्षा ललवानी, कविता नाहर कविता बुरड़अंजलि नाहटा
सोनमश्रीश्रीमाल ,वर्षाचौरडिया,मानसी नाहटा , ममता नाहटा, नरेंद्र बाफना, मीनू बाफना आदि शामिल रहे.,,000

Author: Deepak Mittal












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