भूमिपुत्रों की जमीन पर जेपीएल द्वारा जबरन कब्जे का आरोप..

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शैलेश शर्मा  घरघोड़ा!भले रायगढ़ जिला कागजो में अनुसूचित क्षेत्र घोषित हो और यहां के भूमिपुत्र आदिवासियों के उत्थान और संवर्धन के लाखों कागजी घोड़े दौड़ाए जाते हो पर जमीनी हकीकत इससे कहीं जुदा नजर आती है । ताजा मामला तमनार से सटे ग्राम गारे का है.

जहां के स्थानीय भूमिपुत्रों  द्वारा काबिज वन भूमि पर जबरन जेपीएल कम्पनी द्वारा कब्जा कर मिट्टी फेका जा रहा है जिसकी शिकायत अब कलेक्टर एवं एस डी एम सहित उच्च अधिकारियों को की गई है बावजूद इसके कम्पनी की दादागिरी पर अंकुश लगाने कोई प्रशासकीय पहल होती नही दिख रही ।

काटे दर्जन भर पेड़,मिट्टी पाट कर कब्जे की कोशिश जिंदल के एक कर्मचारी प्रवीण दुबे पर लग रहे आरोप -आवेदक  जगरसाय

बलसाय एवं धनसाय सिदार द्वारा जिले के अधिकारियों को दिए आवेदन में बताया गया है कि उनका परिवार लगभग तीन पीढ़ियों से गारे की सीमा में स्थित वन भूमि पर फसल उगाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं तथैव 300 से अधिक वृक्ष लगाकर उसे संरक्षित करने में भी इस आदिवासी परिवार की अहम भूमिका रही है परंतु इस परिवार से बिना अनुमति लिए जेपीएल द्वारा इनकी वन भूमि से 250 पेड़ काट डाले । जब आवेदकों को कम्पनी द्वारा पेड़ काटने की जानकारी हुई तो उन्होंने कम्पनी और स्थानीय प्रशासन के पास गुहार लगानी शुरू की जो आज पर्यंत जारी है ।

*भूमिपुत्रों को मिलेगा न्याय या चलेगा पूंजीवादी जोर*

  

इस मामले में आवेदक आदिवासी परिवार द्वारा वन भूमि अधिकार पत्र के लिए आवेदन भी किया था जिसे 2016 में ग्राम सभा एवं तत्कालीन अधिकारी द्वारा सत्यापित भी किया गया था पर प्रशासकीय ढिलाई एवं जागरूकता की कमी से अधिकार पत्र इन्हें आज तक नही मिला और इनका सत्यापित आवेदन प्रक्रियाधीन है ऐसे में यह आदिवासी परिवार अपने वाजिब हक के लिए पूंजीवाद से संघर्ष तिस पर प्रशासन के असहानुभूतिपूर्ण रवैये से कैसे अपने हिस्से का न्याय प्राप्त कर पायेगा ये भी देखने वाली बात होगी ।

क्योंकि उच्च अधिकारियों को गुहार लगाने के बावजूद अब तक इस परिवार के हाथ खाली है ना इन्हें मुआवजे की उम्मीद दिख रही ऊपर से जीवन यापन का जरिया भूमि छीन जाने से भूखों मरने की नौबत आ सकती है ऐसे में अपने भविष्य को लेकर चिंतित एक आदिवासी परिवार आदिवासी राज्य में दर दर भटकने मजबूर है ।

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Author: Deepak Mittal

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