छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में राज्य शासन की आपराधिक अपील को केवल देरी के आधार पर खारिज कर दिया है। कोर्ट ने अपने स्पष्ट और सख्त रुख में कहा कि विभागीय प्रक्रिया का हवाला देकर लंबी देरी को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
यह मामला कोरबा जिले से जुड़ा है, जहां विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) ने 15 अप्रैल को आरोपी संजय कुमार यादव, उम्र 34 वर्ष, को साक्ष्यों के अभाव में आरोपों से मुक्त कर दिया था। आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 296 तथा एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(आर) और 3(1)(एस) के तहत मामला दर्ज था।
इस फैसले को चुनौती देते हुए राज्य शासन ने हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की, लेकिन इस अपील में 108 दिनों की देरी हो गई। राज्य की ओर से दलील दी गई कि फाइल प्रक्रिया, विधि एवं विधायी कार्य विभाग से अनुमति, और महाधिवक्ता की राय लेने में समय लगने के कारण यह देरी हुई।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल ने स्पष्ट कहा कि केवल सरकारी प्रक्रियाओं का हवाला देकर देरी को माफ नहीं किया जा सकता। राज्य को भी लिमिटेशन कानून का सख्ती से पालन करना होगा, और अधिकारियों की लापरवाही या ढिलाई को उचित कारण नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला भी दिया। विशेष रूप से ‘स्टेट ऑफ मध्यप्रदेश बनाम रामकुमार चौधरी (2024)’ मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी अत्यधिक देरी पर सख्त रुख अपनाते हुए 1788 दिनों की देरी वाली अपील को खारिज कर दिया था।
इन्हीं तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने देरी माफी आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप राज्य की मुख्य आपराधिक अपील भी स्वतः खारिज हो गई।
Author: Deepak Mittal








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