40 फीट का ‘खौफ का किला’ ढहा! होली से पहले नक्सल गढ़ में गूंजा बुलडोज़र… जंगल में कौन सी बड़ी तैयारी?

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सुकमा के साकलेर में सीआरपीएफ की ऐतिहासिक कार्रवाई, दो घंटे चला जोखिमभरा ऑपरेशन… ‘भारत माता की जय’ से गूंजा इलाका

सुकमा। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके से होली से ठीक पहले ऐसा संदेश निकला है, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की 217वीं बटालियन ने ग्राम साकलेर में 40 फीट से अधिक ऊंचे विशाल नक्सली स्मारक को जमींदोज कर दिया।

यह सिर्फ एक ढांचा नहीं था—यह वर्षों से खौफ, प्रचार और नक्सली वर्चस्व का प्रतीक बना हुआ था।

 शीर्ष अधिकारियों की निगरानी में चला निर्णायक अभियान

यह कार्रवाई डीजी सीआरपीएफ, आईजी सीजी सेक्टर और डीआईजी कोन्टा के मार्गदर्शन में अंजाम दी गई। कमांडेंट विजय शंकर के नेतृत्व में सल्लातोंग कैंप की सी/217 बटालियन ने ऑपरेशन को सफल बनाया।

मैदान स्तर पर सहायक कमांडेंट रवि शर्मा, थाना प्रभारी किस्ताराम और निरीक्षक अजय सोनकर की प्रत्यक्ष निगरानी में पूरी कार्रवाई संचालित हुई।

 01 मार्च 2026: जब गिरा ‘नक्सली प्रतीकों’ का सबसे बड़ा ढांचा

1 मार्च 2026 को ग्राम साकलेर में दो नक्सली स्मारकों को ध्वस्त किया गया। इनमें से एक लगभग 40 फीट से अधिक ऊंचाई वाला था, जिसे किस्ताराम क्षेत्र का सबसे बड़ा नक्सली स्मारक माना जाता था।

यह ढांचा वर्ष 2016 और 2018 में तथाकथित “शहीद सप्ताह” के दौरान बनाया गया था। स्मारक पर ताती भेमई, देशू मुत्ते राजे, सोड़ी हुंगा, कलमू पोज्जा और सोड़ी हिड़मै जैसे नक्सली तत्वों के नाम अंकित थे।

अधिकारियों के मुताबिक, यह स्थान नक्सली महिमामंडन और मनोवैज्ञानिक प्रभाव का केंद्र बन चुका था।

 दो घंटे चला जोखिमभरा ध्वस्तीकरण

स्मारक की ऊंचाई, भारी संरचना और कमजोर आधार के कारण ऑपरेशन बेहद जोखिमपूर्ण था। जेसीबी मशीन से करीब दो घंटे तक नियंत्रित और योजनाबद्ध तरीके से ढांचे को गिराया गया।

किस्ताराम क्षेत्र में अब तक का यह सबसे बड़ा नक्सली ढांचा था, जिसे सुरक्षित तरीके से पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।

 ग्रामीणों का सहयोग, गूंज उठा ‘भारत माता की जय’

पूरी कार्रवाई स्थानीय ग्रामीणों को विश्वास में लेकर शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न की गई। जैसे ही स्मारक धराशायी हुआ, इलाके में ‘भारत माता की जय’ के नारे गूंज उठे।

यह दृश्य सिर्फ एक ढांचे के गिरने का नहीं, बल्कि भय से मुक्ति और विश्वास की वापसी का प्रतीक बन गया।

 रणनीति बदली—अब निशाने पर ‘प्रतीक और विचारधारा’

अधिकारियों के अनुसार, अब अभियान केवल मुठभेड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि

  • नक्सली प्रतीकों का उन्मूलन

  • वैचारिक ढांचे का विनाश

  • भय के मनोवैज्ञानिक प्रभाव का अंत

  • सामाजिक विश्वास की बहाली

  • क्षेत्रीय स्थायित्व की स्थापना

की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाए जा रहे हैं।

 आगे भी चलेगा अभियान

इकाई द्वारा स्थानीय समुदाय के साथ समन्वय कर अन्य अवैध नक्सली स्मारकों और संरचनाओं की पहचान कर उन्हें हटाने की प्रक्रिया भी जारी है।

साफ संदेश है—नक्सलवाद का प्रतीकात्मक, वैचारिक और भौतिक रूप से पूर्ण उन्मूलन।

 क्या यह अंत की शुरुआत है?

होली से पहले जंगल के भीतर गिरे इस 40 फीट के ‘खौफ के किले’ ने यह संकेत दे दिया है कि अब लड़ाई केवल बंदूकों की नहीं, बल्कि विचार और प्रतीकों की भी है।

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Author: Deepak Mittal

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