बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि पीड़िता स्वयं सहमति से आरोपी के साथ गई हो और दोनों के बीच आपसी सहमति से संबंध बने हों, तो ऐसे मामले में अपहरण और दुष्कर्म का अपराध सिद्ध नहीं होता। कोर्ट ने इसी आधार पर आरोपी को बरी किए जाने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।
राज्य शासन ने विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी अत्याचार), रायपुर के 31 अगस्त 2023 के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी। उक्त फैसले में आरोपी धर्मेंद्र कुमार को अपहरण, दुष्कर्म और Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के तहत दर्ज आरोपों से बरी कर दिया गया था।
क्या था मामला?
पीड़िता ने 14 जनवरी 2022 को थाना इंदागांव, जिला गरियाबंद में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि 11 जनवरी 2022 को आरोपी उसे मोटरसाइकिल से अपने गांव ले गया और शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाए। बाद में आरोपी द्वारा विवाह से इनकार करने पर मामला दर्ज किया गया और चार्जशीट पेश की गई।
मेडिकल रिपोर्ट और बयान पर कोर्ट की टिप्पणी
पीड़िता के चिकित्सकीय परीक्षण में शरीर पर किसी प्रकार की बाहरी या आंतरिक चोट नहीं पाई गई। मेडिकल रिपोर्ट में जबरन संबंध की पुष्टि नहीं हो सकी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में उल्लेख किया कि पीड़िता और आरोपी के बीच प्रेम संबंध था। पीड़िता स्वयं आरोपी के साथ गई थी और कई बार रात में उससे मिलने भी गई। डॉक्टर के समक्ष उसने जबरदस्ती से इनकार किया था। अदालत में भी उसने स्वीकार किया कि पुलिस द्वारा लिखित रिपोर्ट पर उसने हस्ताक्षर मात्र किए थे और बयान परिजनों व पुलिस के कहने पर दिया था।
अपील खारिज
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब वह स्पष्ट रूप से अवैध या असंगत हो। चूंकि अभियोजन पक्ष अपहरण या दुष्कर्म को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा, इसलिए एससी-एसटी एक्ट के प्रावधान भी लागू नहीं होते।
इन सभी तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और आरोपी की बरी किए जाने के आदेश को बरकरार रखा।
Author: Deepak Mittal










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