नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट सोमवार को लद्दाख के क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की निवारक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करेगा। यह याचिका उनकी पत्नी डॉ. गीतांजलि जे. आंगमो द्वारा दायर की गई है, जिसमें नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत जारी उनकी लगातार हिरासत को अवैध बताया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जारी कॉज लिस्ट के अनुसार, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ 9 फरवरी को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करेगी। याचिका में कहा गया है कि सोनम वांगचुक की हिरासत मनमानी है और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।
पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से वांगचुक की निरंतर निवारक हिरासत पर पुनर्विचार करने का मौखिक सुझाव दिया था। जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि वांगचुक 26 सितंबर, 2025 से हिरासत में हैं और अदालत के समक्ष पेश मेडिकल रिपोर्ट से उनकी सेहत को लेकर चिंता जताई गई थी। पीठ ने कहा था कि उनकी स्वास्थ्य स्थिति “निश्चित रूप से बहुत अच्छी नहीं” है।
अदालत ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) के.एम. नटराज से कहा था कि सरकार को इस बात पर विचार करना चाहिए कि हिरासत जारी रखना आवश्यक है या नहीं। इस पर ASG नटराज ने अदालत को आश्वासन दिया कि वह इस संबंध में संबंधित अधिकारियों से निर्देश लेंगे।
हिरासत का बचाव करते हुए ASG नटराज ने दलील दी कि NSA एक विशेष कानून है, जो निवारक उद्देश्यों के लिए बनाया गया है। उन्होंने कहा,
“NSA का उद्देश्य किसी व्यक्ति को सार्वजनिक व्यवस्था या राज्य की सुरक्षा के लिए हानिकारक गतिविधियों से रोकना है। निवारक हिरासत कोई सज़ा नहीं है, बल्कि यह हिरासत में लेने वाले अधिकारी के विवेक पर आधारित होती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि जिला मजिस्ट्रेट ने उपलब्ध सबूतों का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के बाद हिरासत का आदेश पारित किया था।
ASG ने आगे तर्क दिया कि सोनम वांगचुक का 24 सितंबर, 2025 को दिया गया भाषण भड़काऊ प्रकृति का था, जिसके बाद लेह में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए। इन घटनाओं में चार लोगों की मौत और 161 लोगों के घायल होने का दावा किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि वांगचुक ने मूल हिरासत आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन हिरासत बढ़ाने वाले बाद के आदेशों को चुनौती नहीं दी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि मूल हिरासत आदेश ही कानूनी रूप से कमजोर पाया जाता है—जिसमें विचार के अभाव का पहलू भी शामिल है—तो बाद की स्वीकृतियां उसे स्वतंत्र रूप से वैध नहीं ठहरा सकतीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि मूल हिरासत आदेश रद्द किया जाता है, तो उससे जुड़ी बाद की सभी कार्रवाइयां स्वतः अमान्य हो जाएंगी।
Author: Deepak Mittal










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