
कोरबा : यह घटना ग्राम रोदे निवासी गौरी शंकर साहू जी के दुखद निधन का वर्णन करती है, जो 27 जुलाई को एक बस दुर्घटना में घायल हो गए थे। उनके पुत्र द्वारा उन्हें हरे कृष्णा हॉस्पिटल, कटघोरा ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने पाया कि उनके पैर में कई जगह फ्रैक्चर हुआ था और उन्हें सर्जरी की आवश्यकता थी।
सर्जरी से पहले किए गए ब्लड टेस्ट में उनके शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी पाई गई, जिसके चलते डॉक्टरों ने उन्हें खून चढ़ाने का निर्णय लिया। पीड़ित के पुत्र के अनुसार, उन्हें कुल 6 यूनिट खून चढ़ाया गया, लेकिन इंटरनल ब्लीडिंग के चलते खून का स्तर नहीं बढ़ पाया। डॉक्टरों की लापरवाही और गलत डायग्नोसिस के कारण इंटरनल ब्लीडिंग से संक्रमण फैल गया, और स्थिति बिगड़ती चली गई।
जब डॉक्टरों को लगा कि मामला उनके नियंत्रण से बाहर हो गया है, तब 31 तारीख को उन्होंने मरीज को रेफर कर दिया। मरीज को बिलासपुर के स्वामी विवेकानंद अस्पताल ले जाया गया, जहां इंफेक्शन का इलाज और सर्जरी की गई, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ।
अंत में मरीज को रायपुर के ग्लोबल स्टार मल्टी स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने उनके पैर काटने की सलाह दी। पैर काटने के बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ, और संक्रमण ने उनके शरीर के अन्य अंगों को प्रभावित करना शुरू कर दिया।



अंततः, 8 अगस्त की शाम को श्री गौरी शंकर साहू जी का निधन हो गया। हरे कृष्णा हॉस्पिटल के डॉक्टरों और स्टाफ की लापरवाही के कारण यह दुखद घटना हुई। अगर सही समय पर इंटरनल ब्लीडिंग की पहचान कर ली जाती और अनावश्यक खून नहीं चढ़ाया जाता, तो शायद आज यह दुखद दिन न आता।
नवभारत टाइम्स की टीम इस कठिन समय में साहू परिवार के साथ खड़ी है और श्री गौरी शंकर साहू जी की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करती है।
Author: Deepak Mittal









