ट्रायल कोर्ट ने जेल में कराई जांच पूरी, सुनाई मृत्यु पर्यंत आजीवन कारावास की सजा
नव भारत टाइम्स 24 x 7 के ब्यूरो चीफ जे.के. मिश्रा की रिपोर्ट:
दुष्कर्म के मामले में जेल में बंद बेटे को बचाने के लिए स्वजन ने उसे मानसिक रोगी बताते हुए सजा माफी की मांग की थी। स्वजन के दावों की जांच के लिए ट्रायल कोर्ट ने चिकित्सक से जांच कराई।
दुष्कर्म के मामले में फैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट ने कहा है कि अपीलकर्ता के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जा सकती, क्योंकि उसने 12 वर्ष से कम उम्र की पीड़िता का यौन उत्पीड़न किया है। पाक्सो अधिनियम, 2012 के तहत विशेष अपराधों में केवल पागलपन के आधार पर आरोपित को छूट नहीं दी जा सकती है। ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए आरोपित को प्राकृतिक मृत्यु तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इसे लेकर कोर्ट ने स्वयं जांच पूरी कराई थी, जिसके बाद फैसला सुनाया गया था।
दुष्कर्म के मामले में जेल में बंद बेटे को बचाने के लिए स्वजन ने उसे मानसिक रोगी बताते हुए सजा माफी की मांग की थी। स्वजन के दावों की जांच के लिए ट्रायल कोर्ट ने चिकित्सक से जांच कराई। चिकित्सीय रिपोर्ट के बाद विचारण के दौरान जेल में बंद आरोपित के व्यवहार की जांच के लिए जेल अधीक्षक को निर्देशित किया गया। जिस बैरक में आरोपित को रखा गया था वहां चार अन्य बंदी थे। बंदियों ने बताया कि आरोपित का व्यवहार सामान्य है और मानसिक रोग के कोई लक्षण नहीं हैं। जेल अधीक्षक की रिपोर्ट के बाद ट्रायल कोर्ट ने पाक्सो अधिनियम के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसे आरोपित ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच में हुई। डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील को खारिज कर दिया है। ट्रायल कोर्ट ने छह साल की बालिका से दुष्कर्म के आरोप में अपीलकर्ता को आजीवन कारावास की सजा के साथ ही 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। जुर्माने की राशि जमा नहीं करने पर एक साल अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी।
यह था मामला:
पांच नवंबर 2020 को दोपहर तीन बजे पीड़िता की चाची अपने घर में थी। पीड़िता की मां और पिता खेत गए थे। पीड़िता की चाची घर के अंदर काम कर रही थी। तभी सभी बच्चे घर आए और बताया कि सामने रहने वाला युवक पीड़िता को काफी देर से अपने घर ले गया है और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया है। इस बीच पीड़िता दरवाजे के पास खड़ी मिली। उसकी चाची के पूछने पर बताया कि आरोपित ने उसके साथ जबरदस्ती संबंध बनाए। इसके बाद डायल 112 वाहन बुलाकर बच्ची को जिला अस्पताल राजनांदगांव ले जाया गया। वहीं पीड़िता की चाची की रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने आरोपित के खिलाफ आइपीसी की धारा 376 और पाक्सो एक्ट की धारा 4, 6 के तहत प्रकरण दर्ज किया। जांच पूरी होने के बाद, पुलिस ने आरोपित युवक के खिलाफ आइपीसी की धारा 376, 376(2)(एन), 342 और पाक्सो अधिनियम की धारा 04 और 06 के तहत आरोप पत्र के साथ रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत की। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, एफटीएससी (पाक्सो), राजनांदगांव के कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने पागलपन की दलील दी थी। डा. एएस राय ने अपनी रिपोर्ट में आरोपित की मानसिक अस्वस्थता की दलील को स्वीकार नहीं किया।
जेल अधीक्षक की रिपोर्ट के बाद ट्रायल कोर्ट ने दिया फैसला:
मामले के लंबित रहने के दौरान ट्रायल कोर्ट ने धारा 329 सीआरपीसी के तहत की। जेल अधीक्षक अक्षय सिंह राजपूत से भी पूछताछ की गई। जेल अधीक्षक ने बताया कि 14 मार्च 2023 को संबंधित ट्रायल कोर्ट से विचाराधीन कैदी को उसकी दैनिक गतिविधियों और नियमित गतिविधियों के बारे में जेल में दिए गए उपचार के लिए अवलोकन रिपोर्ट मांगी गई थी। विचाराधीन कैदी के साथ सह विचाराधीन कैदी उत्तम कुमार भुआर्य, दिनेश कुमार रावटे, सोहन यादव, नोखेलाल साहू, विजय जांगड़े, पवन यादव और जेल में पदस्थ अन्य अधिकारी-कर्मचारियों से उसकी दिनचर्या और व्यवहार के संबंध में पूछताछ की गई। विचाराधीन बंदियों, जेल कर्मचारियों एवं अधिकारियों ने बताया कि आरोपित युवक जेल के अंदर किसी भी प्रकार का असामान्य, आक्रामक अथवा अजीब व्यवहार नहीं करता है तथा वह सामान्य रूप से रहता है। जेल अधीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि गवाहों के साक्ष्यों के अवलोकन से यह नहीं कहा जा सकता है कि अपीलकर्ता अपराध करने की तिथि पर मानसिक विकृति से पीड़ित था।
हाई कोर्ट का फैसला, बना न्याय दृष्टांत:
सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि जब किसी व्यक्ति पर पाक्सो अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध के लिए या भारतीय दंड संहिता के तहत दुष्कर्म का आरोप लगाया जाता है, तो ऐसे आरोप को साबित करने के लिए पीड़िता की उम्र महत्वपूर्ण और आवश्यक होती है। अपराध की गंभीरता तब बदल जाती है जब बच्चा 18 वर्ष से कम, 12 वर्ष और 18 वर्ष से अधिक का हो। पीड़िता की जन्म तिथि 29.05.2014 है और घटना की तारीख यानी 05.11.2020 को वह नाबालिग थी और उसकी उम्र छह वर्ष पांच महीने और छह दिन थी। इस टिप्पणी के साथ डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को उचित ठहराते हुए अपील खारिज कर दी है। हाई कोर्ट का यह फैसला न्याय दृष्टांत बन गया है।
Author: Deepak Mittal












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