अशोक आकाश की कविता *समय धूल सा परत जमाता* सार छंद मात्रा भार- 16-12

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Deepak Mittal

 

जीवन अपना सहज बनाएं, तोड़ सख्त जंजीरें ।
समय धूल सा परत जमाता, खींचो तीव्र लकीरें ।।

रुक सकती क्या कभी जवानी, नदिया रोको धारा ।
सुबह हुई कब चाँदनी छिटकी, डूब रहा ध्रुव तारा ।।
शिशु किशोर हो चढ़ी जवानी, होता बूढ़ा धीरे।
समय धूल सा परत जमाता, खींचो तीव्र लकीरें ।।

तन घावों को वक्त भरेंगे, छिन पड़ाव से डोलो।
पल-पल जीवन दॉंव लगा है, मन की खिड़की खोलो।।
क्या आँसू के भाव बिकेगी, जवाँ खून शमशीरें ।
समय धूल सा परत जमाता, खींचो तीव्र लकीरें।।

पोर-पोर से दर्द झलकता, रूठे अगिन जवानी।
माला टूटी हीरा बिखरा, छूटी लगन रवानी ।।
झूठ ताज सहभागी बनता, सत्य तपे तन चीरे।
समय धूल सा परत जमाता, खींचो तीव्र लकीरें।।

प्रेम दया करुणा तो है बस, उपदेशों की बातें ।
कठिन सिखंज़ा फँसा हिरण दल, शेर करे आघातें।।
तार छेड़ कर संबंधों के,पतित किया प्राचीरें।
समय धूल सा परत जमाता, खींचो तीव्र लकीरें।

Deepak Mittal
Author: Deepak Mittal

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