केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि UPI से भुगतान स्वीकार करने वाले कारोबारियों को हमेशा मुफ्त लेनदेन की सुविधा देने का कोई आश्वासन नहीं दिया गया था। सरकार ने 2,000 रुपये से अधिक के कुछ UPI लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के प्रस्ताव का भी बचाव किया।
केंद्र ने 4 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में कहा कि MDR की संशोधित व्यवस्था लागू करने पर काफी पहले से विचार किया जा रहा था। इसे अंतिम रूप देने से पहले संबंधित पक्षों से चर्चा भी की गई थी।
सरकार ने स्पष्ट किया कि कारोबारियों को शून्य MDR व्यवस्था लगातार जारी रखने का कोई विशेष आश्वासन नहीं दिया गया था। साथ ही, इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सरकार की ओर से दी जाने वाली सब्सिडी अनिवार्य नहीं, बल्कि सरकार के विवेक पर निर्भर थी।
यह जवाब वकील अंजन दत्ता की ओर से दाखिल जनहित याचिका (PIL) के संबंध में दिया गया है। याचिका में MDR की संशोधित व्यवस्था को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।
केंद्र सरकार ने लेनदेन की राशि, भुगतान के तरीके और कारोबार की श्रेणी के आधार पर अलग-अलग शुल्क व्यवस्था को उचित ठहराया है। सरकार के मुताबिक, 2,000 रुपये की सीमा इसलिए तय की गई है, ताकि आम खुदरा लेनदेन और छोटे कारोबारियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े।
हलफनामे में कहा गया है कि बड़े मूल्य के लेनदेन पर मामूली शुल्क लगाया जा सकता है, क्योंकि ऐसे कारोबारी इस शुल्क को वहन करने की बेहतर स्थिति में हैं।
केंद्र ने UPI और RuPay डेबिट कार्ड के लिए अलग-अलग व्यवस्था रखने का भी बचाव किया। सरकार का कहना है कि दोनों भुगतान प्रणालियों की तकनीकी संरचना, कारोबारी मॉडल और लागत का ढांचा अलग-अलग है। RuPay पर शून्य MDR व्यवस्था जारी रखने का उद्देश्य घरेलू कार्ड भुगतान नेटवर्क को बढ़ावा देना है।
Author: Deepak Mittal









