आरटीआई बना मजाक: चार महीने बाद भी नहीं मिली जानकारी, शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल

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बालोद। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 आम नागरिकों को पारदर्शिता और जवाबदेही दिलाने का सशक्त माध्यम माना जाता है, लेकिन बालोद जिले में यही कानून अब कागजों तक सिमटता नजर आ रहा है।

शहर निवासी प्रदीप चोपड़ा द्वारा शिक्षा विभाग में लगाई गई आरटीआई आवेदन को चार महीने से अधिक समय बीत चुका है, बावजूद इसके अब तक उन्हें कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। इससे विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

प्रदीप चोपड़ा ने जनवरी 2026 में जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के अंतर्गत आरटीआई आवेदन प्रस्तुत कर राष्ट्रीय कार्यक्रम से जुड़े वित्तीय एवं प्रशासनिक जानकारी मांगी थी।

नियमानुसार 30 दिनों के भीतर जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य होता है, लेकिन निर्धारित समय सीमा बीतने के बाद भी विभाग ने कोई जवाब नहीं दिया। मजबूर होकर उन्होंने प्रथम अपील दायर की, जिसकी सुनवाई भी हो चुकी है, फिर भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।

प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, प्रथम अपील में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि मांगी गई जानकारी निर्धारित समय के भीतर उपलब्ध कराई जाए। इसके बावजूद शिक्षा विभाग की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। यह स्थिति न केवल सूचना के अधिकार अधिनियम की अवहेलना है, बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों का भी सीधा उल्लंघन है।

पीड़ित प्रदीप चोपड़ा का कहना है कि “मैं पिछले चार महीनों से लगातार कार्यालय के चक्कर काट रहा हूं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिलता है। न कोई स्पष्ट जवाब दिया जा रहा है और न ही जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। अब मेरे पास मीडिया के माध्यम से अपनी आवाज उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।”

स्थानीय नागरिकों उपेन्द्र कुमार साहू, प्रकाश कुमार,रोहित शर्मा,दीपक जैन, सार्थक में भी इस मामले को लेकर नाराजगी देखी जा रही है। शहर के एक जागरूक नागरिक भेष कुमार ने कहा कि “यदि आरटीआई जैसे कानून का भी पालन नहीं होगा, तो आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करेगा? यह सीधा-सीधा सिस्टम की विफलता है।”

वहीं इस पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी मधुलिका तिवारी का कहना है कि “आवेदक द्वारा मांगी गई जानकारी संकलन की प्रक्रिया में है। कुछ बिंदुओं पर संबंधित कार्यालयों से जानकारी प्राप्त की जा रही है, जिसके कारण विलंब हुआ है। जल्द ही पूरी जानकारी उपलब्ध करा दी जाएगी।”

हालांकि विभाग का यह जवाब सवालों के घेरे में है, क्योंकि प्रथम अपील के बाद भी जानकारी उपलब्ध नहीं कराना विभागीय उदासीनता को दर्शाता है। यह पूरा मामला प्रशासनिक सुस्ती, जवाबदेही की कमी और कानून के प्रति लापरवाही को उजागर करता है। यदि समय रहते इस पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला और बड़ा रूप ले सकता है तथा संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर व्यापक जांच की मांग उठ सकती है।

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Author: Deepak Mittal

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