Rath Yatra 2025: गैर हिंदू भी हैं महाप्रभु जगन्नाथ के परम भक्त, जानें सालाबेग की कहानी

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Rath Yatra 2025: ओडिशा के पुरी में स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर को लेकर धारणा है कि यह केवल हिंदुओं के लिए आरक्षित है, मगर क्या आप जानते हैं महाप्रभु के उस परम भक्त के बारे में जो गैर हिंदू था।

जगत के रचयिता जगन्नाथ महाप्रभु के मंदिर को आस्था का प्रतीक माना जाता है। यह मंदिर सिर्फ मंदिर नहीं है, यहां की कथाएं, पौराणिक रीति-रिवाज एवं रस्में ऐसी है कि लोग अपने आप उनके दर्शन करने के लिए व्याकुल हो उठते हैं। भगवान जगन्नाथ की हर साल आषाढ़ के महीने में रथयात्रा निकलती है। पुरी में होने वाली यात्रा में लाखों लोग शामिल होते हैं, मगर देश के अन्य राज्यों में भी इस त्योहार को धूमधाम से मनाया जाता है।

बेंगुरू, कोलकाता, दिल्ली, गुजरात से लेकर यूपी के कानपुर, नोएडा में भी रथयात्रा का कार्यक्रम आयोजित होता है। बता दें कि यहां भी लाखों भक्त रथ खींचने आते हैं। प्रभु पूरे 9 दिनों तक अपने घर उर्फ मंदिर से बाहर आते हैं, ताकि अपने हर उन भक्तों को दर्शन दे सके, जो मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। भगवान जगन्नाथ के वैसे तो लाखों भक्त हैं लेकिन इस भक्त के बारे में नहीं जानते होंगे, जिससे मिले बिना भगवान का रथ आगे नहीं बढ़ पाता है। आइए जानते हैं इस भक्त के बारे में।

कौन थे ये गैर हिंदू भक्त?

प्रभु जगन्नाथ के परम भक्त का नाम सालाबेग था। प्रचलित किवदंतियों के अनुसार, सालाबेग प्रभु का गैर हिंदू भक्त था, जो हिंदू और मुस्लिम, दोनों धर्मों से ताल्लुक रखता था। दरअसल, सालाबेग के पिता एक मुगल सूबेदार के बेटे थे। सालाबेग की माता हिंदू धर्म में ब्राह्मण वर्ग की थी। सालाबेग का पालन-पोषण माता-पिता ने मिलकर किया था और दोनों धर्मों के बारे में उन्हें बताया गया था। उनकी माता भगवान जगन्नाथ की भक्त थी, वे उन्हीं से उनके बारे में सुनती थी। बस ऐसे ही प्रभु की कथाओं के बारे में सुनते-सुनते उन्हें प्रभु के प्रति मोह हो गया और वे उनकी भक्ति करने लगे।

पुरी छोड़कर जाना पड़ा था

कथाओं के अनुसार, सालाबेग पहले अपने परिवार के साथ पुरी में ही रहते थे। मगर उनके पिता के निधन के बाद उन्हें अपनी माता के साथ वहां से जाना पड़ा था। कुछ समय बाद उनकी माता भी चल बसी। भक्त सालाबेग ने मन बनाया कि उन्हें भी जगन्नाथ जी की रथयात्रा में शामिल होना है। इसलिए, वे अपने घर से पैदल ही निकल पड़े। सालाबेग काफी दूर तक पैदल यात्रा करते हुए मंदिर के करीब तो पहुंच गए लेकिन वे रथयात्रा में नहीं पहुंच पाए। वे रथ के चलने के समय तक वहां पहुंच नहीं पाए और निराश हो गए।

 

 

आगे नहीं बढ़ पाया रथ

इस कथा में आगे हुआ यूं कि भगवान जगन्नाथ का भक्त सालाबेग, जो समय से रथयात्रा में शामिल होने के लिए पुरी नहीं पहुंच पाया था, वह एक पेड़ के नीचे बैठकर रोने लगा और दुख मनाने लगा कि उनके पास प्रभु के दर्शन के लिए सिर्फ रथयात्रा का ही मौका था, मगर वे तब भी नहीं पहुंच पाए। उन्होंने भगवान से कहा कि अगर वे उनके परम भक्त हैं, तो उनका रथ बिना सालाबेग के आगे नहीं बढ़ेगा। बस फिर, कुछ ऐसा ही हुआ। प्रभु का रथ वहीं ठहर गया और उसके पहियों ने आगे बढ़ना बंद कर दिया।

राजा ने सालाबेग को बुलवाया

एक तरफ जहां सालाबेग अपने गम में थे, तो वहीं दूसरी ओर भगवान के रथ ने भी आगे बढ़ना बंद कर दिया था। रथ को रुका हुआ देखकर यात्रा में शामिल सभी लोग, राजा, पंडित-पुजारी से लेकर अन्य सेवादारों को इस बात का भय होने लगा कि शायद उन लोगों ने भगवान की पूजा-अर्चना सही से नहीं की है या फिर उनसे कोई गलती हो गई है। भगवान इसलिए नाराज हो गए हैं और सभी को इसका पाप भुगतना होगा। मुख्य पुजारी और राजा के बीच संवाद हुआ कि इस बात की जड़ तक पहुंचा जाए।

सालाबेग के साथ अपने सभी भक्तों को निराश देख भगवान जगन्नाथ ने मुख्य पुजारी को संकेत दिया कि उनका एक भक्त है, जो उनका इंतजार कर रहा है। उन्हें रथयात्रा में शामिल किया जाए। जैसे ही पुजारी ने यह बात राजा को बताई, तो उन्होंने अपनी सेना को भेजकर सालाबेग को बंधक बनाकर प्रभु के पास ले आए। यहां राजा ने सालाबेग से पूछा कि आखिर तुमने प्रभु से कैसी इच्छा मांग ली है कि उनका रथ नहीं बढ़ रहा है, अब इसका समाधान तुम ही निकालो।

सालाबेग के आग्रह पर चला रथ

भक्त सालाबेग ने जैसे ही यह बात सुनी, वह अति प्रसन्न हो उठे की प्रभु ने उन्हें खुद अपने पास बुलाया दर्शन देने के लिए। इसके बाद सालाबेग जगन्नाथ जी के सामने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करते हैं और उनसे आग्रह करते हैं कि प्रभु, अब मैं आ गया हूं, मेरे साथ-साथ आपके करोड़ों भक्त भी आपका इंतजार कर रहे हैं, इसलिए अब आप आगे बढ़िए। अब इसे चमत्कार कहें या नहीं, मगर सालाबेग के ऐसा कहते ही दोबारा भगवान की पूजा हुई और सालाबेग के साथ अन्य सभी भक्तों ने जय जगन्नाथ का नारा लगाते हुए रथ खींचा और रथ आगे बढ़ गया।

आज भी मजहार पर रुकता है प्रभु का रथ

मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के समय आज भी प्रभु का रथ सालाबेग की मजहार पर जाता है और वहां कुछ देर रुकता है। इसके बाद ही रथ आगे बढ़ता है। यह वहीं स्थान है जहां प्रभु का रथ रुका था। भक्त सालाबेग उस घटना के बाद सदा के लिए पुरी का हो गया था और हर वर्ष रथयात्रा का इंतजार करता था, ताकि प्रभु उससे मिलने आएं और वे उनके दर्शन कर सकें और उनके रथ को खींच सकें।

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Author: Deepak Mittal

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